..जिंदगी के नशे में.……

जिंदगी के नशे में \ कुछ गाता हूँ \ गुनगुनाता हूँ \ कभी चीखता चिल्लाता हूँ \ रोता रुलाता हूँ \ तो कभी हँसता हंसाता हूँ \ या कभी चादर ओढ़ कर \ चुप-चाप सो जाता हूँ…

Saturday, 2 May 2015

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           कविता के पाठकों का घटते जाना हाल के समसामयिक गोष्ठियों में चर्चा में बना रहता है। लोग चिंतित दिखते हैं की आज अभिव्यक्ति की बढ़त...
1 comment:
Thursday, 23 April 2015

उलझन

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लिखने को तो जी बहुत कुछ चाहता है पर डर लगता है कहीं शब्दों की झाड़ियों में जिंदगी उलझ कर न रह जाए। read this in the context...
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Dayanand Arya
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