..जिंदगी के नशे में.……

जिंदगी के नशे में \ कुछ गाता हूँ \ गुनगुनाता हूँ \ कभी चीखता चिल्लाता हूँ \ रोता रुलाता हूँ \ तो कभी हँसता हंसाता हूँ \ या कभी चादर ओढ़ कर \ चुप-चाप सो जाता हूँ…

Monday, 21 September 2015

मलवा

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अरे ! क्यों गिराते हो दीवारों को? इनमें भी एक जीता जागता जीवन है! क्या कहा - ? सड़न है, दुर्गन्ध आती है, सीलन है, दीवारें जर्जर हैं , ...
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Wednesday, 2 September 2015

दिल्ली से बिछुड़ते समय

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मैं नहीं चाहूँगा  की दिल्ली मेरे रग रग में बहे  जरूरत बनकर। मैं चाहूँगा की जैसे  यादों की खुसबू बनकर  मौके बेमौके महकते हैं  देहरादून ...
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Dayanand Arya
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