..जिंदगी के नशे में.……

जिंदगी के नशे में \ कुछ गाता हूँ \ गुनगुनाता हूँ \ कभी चीखता चिल्लाता हूँ \ रोता रुलाता हूँ \ तो कभी हँसता हंसाता हूँ \ या कभी चादर ओढ़ कर \ चुप-चाप सो जाता हूँ…

Wednesday, 21 October 2015

रक्षक

›
बस बोलने भर से तुम रक्षक नहीं बन जाते देश के इतिहास-भूगोल के सभ्यता-संस्कृति के... खुद को रक्षक मानते हो तो ये कुल्हारी? क्या कहा?-...
Saturday, 10 October 2015

कविता ऐसी भी क्या? किस काम की ?

›
तुम्हारा कवित्व सोना है - उछालो उसे- खड़ा और चमकदार - ताकि दुनिया गुणे । उसे गुदरी में क्या छिपाना की कोई पहचान न सके कोई डिटेक्टर ...
‹
›
Home
View web version

अपना क्य़ा है :-

Dayanand Arya
View my complete profile

Pages

▼
Powered by Blogger.