Saturday, 10 October 2015

कविता ऐसी भी क्या? किस काम की ?

तुम्हारा कवित्व सोना है -
उछालो उसे- खड़ा और चमकदार
- ताकि दुनिया गुणे ।

उसे गुदरी में क्या छिपाना
की कोई पहचान न सके
कोई डिटेक्टर लगाना पड़े -
विद्वान्-पंडित बुलाने पड़े
उसके गुण धर्म समझने के लिए।

सोना - ऐसा भी क्या?
किस काम का?

Thursday, 1 October 2015

ये कैसी लपलपाती आग है


ये कैसी लपलपाती आग है
जो जल रही है।
जिसके जद में खरगोश, चूहे, बिल्ली, आते हैं
और आते है घास, पतवार,
हिरन, बकरी, कुत्ते और सियार।

सब जल रहे हैं
उबल रहें हैं
और एक दूसरे को जला रहे हैं
झुलसा रहे हैं ।

किसी को एक चीटीं काट ले
तो जाग उठती है उसकी जलन
लपटें छोड़ता निकल पड़ता है
अपराधी की तलाश में
जलाने अपने जैसे किसी को
प्रतिशोध की आग में
वह नियंता सजा मुक़र्रर करता है
सजाये मौत बाटता फिरता है
अपने जैसे नाकारों के बीच।

पर हाथी और शेर
इस आग की चपेट में नहीं आते
वो तो इस आग की लपट पर
अपनी अपनी रोटिया और गोस्त सेंकतेे हैं।




Images : courtsy google
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