Showing posts with label मंजिल. Show all posts
Showing posts with label मंजिल. Show all posts

Wednesday, 23 September 2015

inspirations to cross the darkness of night


रात :
पर मैं जी रहा हूँ निडर
जैसे कमल
जैसे पंथी
जैसे सूर्य
क्योंकि
कल भी हम खिलेंगे
हम चलेंगे
हम उगेंगे


और वो सब साथ होंगे
आज जिनको रात ने भटक दिया है।
                                                   -धर्मवीर भारती


- गीता के सार सी मालूम होती हैं मुझे ये पंक्तियाँ । निराशा के क्षणों में ये पंक्तियाँ भाग्यवाद का विरोध किये बगैर उससे परे हो जाने का साहस देती है । हम निर्भीक हैं इसलिए नहीं की वक़्त सबकुछ ठीक कर देगा बल्कि इसलिए की हम हारे नहीं हैं हम अभी भी खिलने, चलने और उगने का माद्दा रखते हैं। रात्रि के विश्रान्ति के बाद जब हम फिर से तरो-ताजा होकर खिलेंगे, चलेंगे और उगेंगे तो हम अपनी हर खोयी हुयी उपलब्धियों को फिर से हासिल कर लेंगे।

...........................................................................





रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियाँ भी निराश होने की मनाही उसी तरह करतीं है जैसे William Wordsworth की ये पंक्तियाँ-





Saturday, 25 May 2013

बावरा-मन


(आज सुबह से ही वह कुछ अजीब सा महसूस कर रहा था- कुछ बँटा-बँटा सा। पहले से चली आ रही उदासी भी, और उसको झुठलाती हुई, उसको चीड़ती हुई एक ताजगी भी। आइने में भी उसने ख़ुद को कुछ बदला हुआ सा पाया। अचानक आइने में उसके दो-दो अक्श उभर आये- वह मू्क दर्शक बना खड़ा रहा । दोनो अक्श, एक हारा हुआ और दूसरा जीतने को उत्साहित, बारी-बारी से अपना पक्ष रख रहे थे- )


1.

अधूरी राहों पे

अधूरे मन से

यूँ ही मैं........ चलता रहा ।


कहीं चल..... रे मन बावरे
सपनों..... का वो गाँव रे
जहां हो..... घनी छाँव रे
न जले..... जहाँ पाँव रे ।

वहीं चल..... रे मन बावरे .............

2.

अधूरी ठोकरें

अधूरे सहारे

मैं गिरता रहा........ सम्हलता रहा ।


मंजिलें..... आज ओझल तो क्या
रास्ते..... आज बोझिल तो क्या
रुकना.......... ना तूँ राह में
आगे तूँ ........ बढ़ा पाँव रे ।

चला - चल..... रे मन बावरे .............
3.

अधूरा सा ख्वाब

अधूरी नींदों 

मेंजाने क्यूँ........ पलता रहा ।


बस था........ वो इक ख्वाब रे
हो गया.......... जो बर्बाद रे
रह गया........ जो पीछे कहीं
क्यों करे........ उसे याद रे ।

चल ना ..... रे मन बावरे .............


4.

अधूरा ये सावन

किस अधूरी आग में

धुँआ-धुँआ........ जलता रहा ।


तेरे मन........ की वो बात रे
कोई हो........ तेरे साथ रे
तुझपे........ हो जिनको यकीं
तेरे हों........ जो दिन रात रे ।

वहीं चल..... रे मन बावरे .............

5.

अधूरा ये जीवन

अधूरी ख्वाहिशें लिये

बस यूँ ही........ ढ़लता रहा ।


पाएगा ........ तुँ मंजिल कभी
हसरतें........ होंगी पूरी सभी
जिन्दगी........है ये सौगात रे
खुद खुदा........ है तेरे साथ रे ।

चल दे ..... तूँ मन बावरे .............

_________________________________________________________

( और उसे लगा कि सच ‌में उसका खुदा उसे नयी स्फूर्ती के साथ आगे बढ़ने के लिये प्रेरित कर रहा है | )
Images : courtsy google
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...