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Saturday, 7 May 2016

दो कवितायेँ

              (1)

हालाँकि मुझे अधिकार नहीं है
फिर भी मैं चाहता हूँ
की तुम आजादी के लिए प्रयत्न करो
इसलिए नहीं की सब ऐसा करते हैं,
किसी फैसन में बने रहने के लिए नहीं
चलन की गुलामी में नहीं ।
पंख खोलने से पहले
अपनी आँखे खोलो
और दुनिया को खुद नजर से देखो
उधार के नजरिये से नहीं ।

      *      *      *

         
            (2)

सोंचता हूँ
की मैंने क्या -क्या सोंच रखे थे
तुम्हारे लिए....
फिर सोंचता हूँ
की क्या! मुझे अधिकार था
तुम्हारे लिए कुछ सोंचने का ?
और फिर सोंचता हूँ
क्या मैंने वास्तव में तुम्हारे लिए सोंचा था,
या वो मेरे ही शौक थे ।


Sunday, 4 January 2015

चांदनी के नशे में

यूँ चांदनी पीते-पीते हम तुम
किस नशे में उड़ चले हैं
चाँद तक
तारों तक
तारों के एक गुच्छे से  दूसरे गुच्छे तक
कई मन्दाकनियों को पार कर
ब्रह्माण्ड के एक छोड़ से दूसरे छोड़ तक.…












आओ न !....
यहीं, इस मंदाकनी के किनारे
नव-तारों के बागीचे के बीचो-बीच
एक प्यारी सी कुटिया बनाते हैं।
तुम हर सुबह
मेरे केशों में सजाने को
ओस बिछे घाँस पर से
टूटे तारे चुन कर लाया करना …
मेरे केशों में
मालती के फूल से वो तारे
तुम्हे बहुत पसंद आएंगें न …

ऐसे ही किसी दिन
तुम रास्ते पर बिखरे
कुछ छुद्र ग्रह बटोर लाना
मैं उनको कूट-पीस कर
हथेलियों में मेंहँदी रचा लूँगी
और आँगन की लताओं पे लगे
रक्तिम तारों के रस से
पावों में महावर भी लगा लूँगी  ...
मेरी दोनों सूनी कलाइयों के लिए
वृहस्पति और शनि के वलय मँगवा लेना
और ध्रुव तारे का एक टीका भी बनवा देना … 
फिर उस ढलती साँझ को
सूरज की लाली से
मेरी कोरी माँग भर देना …
मुझे सदा सुहागन का आशीर्वाद देने
सप्तर्षि-गण भी आएँगें न ...


फिर उसी रात
दुग्ध मेखला में लिपटी
लाज से दोहरी
जब मैं तुम्हारे पास आऊँ
तो जुगनू सा टिमटिमाता चाँद
जो तुमने कुटिया के छत से टाँक रखा है
मेरी हथेली में रख देना …
मैं उसे तुम्हारा प्रथम उपहार मान कर
सहेज कर अपने पास रख लूँगी
ताकि चाँदनी का यह नशा
कभी न उतरे। है न …




 

Monday, 24 February 2014

बहता मन


सोंचता हूँ बहने दूँ मन को
इन मदमस्त हवाओं के साथ
के शायद खुद ढूँढ़ सके
कि यह क्या चाहता है।
के शायद कहीं इसके सवालों का
जवाब मिल जाये
के शायद कहीं इसके ख्वाबों को
पनाह मिल जाये
या फिर यह भूल कर
उन ख्वाबों  को
उन सवालों को
रम जाये नए नजारों में।
या घूम आए पूरी दुनिया
देख आये पूरी धरती का सौंदर्य
किसी निर्लिप्त मुसाफिर कि तरह। 
            .... और नहीं तो
बस लौट आये ऐसे ही ,
मैं समझ लूँगा
कि इसका कुछ नहीं हो सकता।

Thursday, 12 January 2012

Parinda परिंदा

|| परिंदा ||
था वो एक परिंदा
पर समझता रहा खुद को पतंग,
सीखा था उड़ना उसने
बंध कर डोर की सीमा में,
इशारों पे पतंगबाज के ;
काँप उठता था कल्पना करके 
डोर से अलग होने के बाद की अपनी गति |

   *         *         *

उस दिन जब अचानक
नियति ने उससे छीन  लिया
डोर का सहारा
और धकेल दिया खुले आसमान में ;
उसने पाया एक नया आकाश ,
एक नया सहारा, एक नया एहसास ;
आज वो आजाद था उन्मुक्त गगन में 
उड़ने को अपनी मर्जी  से
ऊपर, ऊपर और ऊपर,
और स्वच्छंद था नीचे जाने को भी,
आज वो उत्तरदायी था तो सिर्फ अपने प्रति,
न  की किसी  अनजाने पतंगबाज  के प्रति |  
   *       *       *


Images : courtsy google
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