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Wednesday, 21 October 2015

रक्षक

बस बोलने भर से तुम रक्षक नहीं बन जाते
देश के इतिहास-भूगोल के
सभ्यता-संस्कृति के...

खुद को रक्षक मानते हो तो ये कुल्हारी?
क्या कहा?-
इस वाटिका की रक्षा के लिए ।
इसपे होने वाले हमले से लोहा लेने के लिए ।
बेडौल, बेतरतीब उग आये
झार-पतवार से निपटने के लिए ।
लेकिन मैंने तो तुम्हे अक्सर उन वट- पीपलों पे वार करते देखा है
जिनके छाँव तले
वाटिका पनपी है ।

नासमझों!
कुछ न समझ आये तो
कुल्हारी फ़ेंक दो
रक्षक होने का भाव छोड़ दो।
जब तक ये वट-पीपल हैं
चमकता सूरज है
धरती उर्वर है
वाटिका में पौधे उगते रहेंगे
नित नए-नए।





Thursday, 1 October 2015

राक्षस



आँख खोलोगे तो देखोगे की मैं नहीं हूँ
मैं बन गया हूँ एक राक्षस
क्योंकि मुझे सपना आया था
की मुझपे कोई अत्याचार हुआ है।

Wednesday, 18 September 2013

हिंसा का बुल्डोज़र

बीच चौराहे पे पड़ी थी उसकी लाश
जो चीख़ -चीख़  बताए जा रही थी  हत्यारों के नाम।
लोगों में आक्रोश था;
चारों ओर  भयानक शोर था;
कोई नहीं सुन पा रहा था  वो भयानक चीख
जो बेतहासा भागदौड़ में दब गई थी।

चप्पे-चप्पे में दहशत और वहशत फैलता जा रहा था
और लाशों की संख्या बढ़  रही थी
उनकी भी वही चीख-
उसी तरह आक्रोश के बुल्डोज़रों तले रौंदी गयी।

यह बुल्डोज़र पुरे शहर को रौंदता रहा
गली- गली , चप्पे - चप्पे
कोई घर अछूता न बचा
हजारों लाशें अब एक साथ चीख रही थीं -
हमें किसी हिन्दू या मुसलमान ने नहीं मारा,
किसी क्षेत्र विशेष के लोगों ने,
या भाषा विशेष, जाति  विशेष,
या किसी वाद के समर्थकों ने हमें नहीं मारा ,
हमारी हत्या कराती हुई  जो हुजूम गुजरी
उसमे वही  गिने चुने चेहरे थे-
कहीं डर, कहीं स्वार्थ,
कहीं ईर्ष्या, तो कहीं लोभ,
कही घमंड और मदान्धता
और कहीं बदले की कुत्सित भावना ,
इनसे से मिलते-जुलते और भी कुछ चेहरे।

पर अब सुनने वाला कोई न बचा था
और बुल्डोज़र  बढ़ चुका  था किसी दूसरे शहर की ओर। 
हिंसा का बुल्डोज़र 
Images : courtsy google
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