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Saturday, 16 April 2016
Saturday, 21 March 2015
निंदिया
निंदिया के घरौंदों में सपनों को बुला लेना
पलकों के किवाड़ों को हौले से सटा लेना ।
टूटे न देखो ये निंदिया …
मोती से नयनों की निंदिया …
सपनों-सपनों मचलती ये निंदिया … ।।
हिडोले पे मद्धम सुरों के - ख्वाबों की अनगिन कहानी
सांसों की तुतली जुबानी - मन ही मन में सुना देना
पलकों के किवाड़ों को हौले से सटा लेना ।
टूटे न देखो ये निंदिया …
नाजुक सी ज्यूँ बंद कलियाँ …
चाँद - तारों गुजरती ये निंदिया … ।।
उजला सवेरा उगेगा - रात के पार वाली जमीं पर
रात काली अँधेरी है तो क्या - ख़्वाब में है चमकता हुआ कल
यूँ अंधेरों से जब सामना हो - दीप दिल में जला लेना
पलकों के किवाड़ों को - हौले से सटा लेना ।
टूटे न देखो ये निंदिया …
थक के सोती सुरीली सी निंदिया …
ख्वाब कल की संजोती ये निंदिया.... ।
Tuesday, 13 January 2015
Sunday, 12 October 2014
अहसास
एक अहसास
तेरे पास होने का
सिहरन
तेरी सांसों से छूने सा
खुशबू सी
हवा में यूँ फैल गयी
चटक सा गया हो
कोई फूल अधखिला
जाने क्या था
वो झुकी पलकों सा
चाँद के पार चला
कोई पंछी मनचला
जैसे कुछ कहने सा
वो पलक उठने सा
सूरज से, किरणों से
रौशन था सवेरा
इधर से उधर -
यहाँ से वहां
तूँ जैसे फैल रही
मैं तुम्हारा हूँ
जैसे तुम हूँ
तुम्ही हूँ।
Saturday, 10 May 2014
उपासना
तुझे मेरे लिये नदी बनाना होगा प्रिये !
उनका बहाव भी
और कल-कल स्वर भी ;
फूल भी
पत्ते भी
डालियाँ भी
और पूरा का पूरा पेड़ भी ;
घाँस भी
उनपर पड़ी ओस की बूँदें भी
और उनमे प्रतिबिम्बित स्वर्ण रश्मियाँ भी;
रात भी
चाँद भी
और चांदनी भी ;
धूप भी
सूरज भी
उषा में उसका आगमन भी
और संध्या में उसका प्रस्थान भी ;
हवा भी
बादल भी
और बारिश भी ;
पर्वत भी
उसकी ऊंचाई भी
और उसपर फैली बर्फ की चादर भी;
झील भी
उसमे प्रतिबिम्बित दृश्य भी
और उस झिलमिल लय को तोड़ कर मुस्कराता कमल भी ;
और भी न जाने कितना कुछ
क्योंकि मैं इन सब रूपों में आज तक तुम्हे ढूंढता आया हूँ।
क्योंकि इन सब रूपों में
मैं तुम्हारी उपासना करना चाहता हूँ।
उनका बहाव भी
और कल-कल स्वर भी ;
फूल भी
पत्ते भी
डालियाँ भी
और पूरा का पूरा पेड़ भी ;
घाँस भी
उनपर पड़ी ओस की बूँदें भी
और उनमे प्रतिबिम्बित स्वर्ण रश्मियाँ भी;
रात भी
चाँद भी
और चांदनी भी ;
धूप भी
सूरज भी
उषा में उसका आगमन भी
और संध्या में उसका प्रस्थान भी ;
हवा भी
बादल भी
और बारिश भी ;
पर्वत भी
उसकी ऊंचाई भी
और उसपर फैली बर्फ की चादर भी;
झील भी
उसमे प्रतिबिम्बित दृश्य भी
और उस झिलमिल लय को तोड़ कर मुस्कराता कमल भी ;
और भी न जाने कितना कुछ
क्योंकि मैं इन सब रूपों में आज तक तुम्हे ढूंढता आया हूँ।
क्योंकि इन सब रूपों में
मैं तुम्हारी उपासना करना चाहता हूँ।
Thursday, 13 February 2014
प्रेम का डेल्टा प्रदेश
तुमने ही तो मुझसे कहा था अनु ! माना कि मैं तुम्हारे track में न पायी पर तुमने ही तो अपना पता लगने न दिया। माना की मैं इधर कुछ महीनों से थोड़ी ज्यादा बिजी हो गयी थी पर तुमने तुमने ही तो कहा था सेवा भाव से पूजा समझ कर अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के लिये ; और इधर तुमने ही ख़ुद तक पहुँचने के सारे रास्ते बन्द कर लिये। पुराने दोस्तों से तुम्हारा कोई संपर्क नहीं है; घर वालों से तो तुम्हें पहले भी कोई मतलब नहीं था social sites पे भी तुम कभी नहीं रहे; पुराने office में भी कुछ खोज-खबर नहीं। तुम हो किस शहर में यह भी तो पता नहीं चल पा रहा। मैं काफी दिनों से महसूस कर रही थी कि तुम मुझसे कुछ खिंचे-खिंचे से रहते थे। पर अनु ! तुम ही तो थे जिसने मुझे हौसला दिया था।
कितने खुश थे तुम जब मेर result आया था। और उस दिन भी जब मैं इंटरव्यू देने गयी थी। तुमने ही तो मुझे interview के लिये तैयार किया था। और जब offer letter आया था; मेरा दिल तो बैठा जा रहा था। अपना शहर, अपना मुल्क छोड़ कर मैं कैसे रह पाऊँगी। पर तुम तो तब भी काफी खुश थे। कहा था " UNO में इतनी अच्छी नौकरी, मन लायक काम, और रहना भी तो आस-पास ही है; यहीं indian subcontinent में। हम आपस में contact में रहेंगे। बीच-बीच में मिलते भी तो रहेंगें। " पर मेरा मन तो तब भी नहीं मान रहा था। पता नहीं कुछ डर सा लग रहा था कि काफी कुछ छूट जाएगा।किसी भी तरह से मैं तुमसे अलग होने के लिए खुद को मना नहीं पा रही थी। नया जगह! नए लोग! और फिर काम भी तो कितना involving था; मैं कितना आशंकित थी। मेरे मन में तो आया था कि क्यों इन पचड़ों में पड़ना; सब छोड़ कर यहीं सेटल हो जाते हैं तुम्हारे साथ। उस दिन मैंने तुमसे लगभग यह कह भी तो दिया था। भले इस अंदाज में नहीं की तुम्हे कुछ जवाब देना ही पड़े। मगर तुम मुझे कितनी अच्छी तरह समझते थे अणु ! तुमने मेरे उस निवेदन को भी समझ लिया था और उसे खींच कर अचानक सतह पर लाने वाले डर को को भी। तभी तो तुमने लौटते समय मेरे पर्स में वो पर्ची डाल दी थी ; जिसने मेरे future को यह shape दिया। कितने अधिकार से तुमने कहा था -
"
कितने खुश थे तुम जब मेर result आया था। और उस दिन भी जब मैं इंटरव्यू देने गयी थी। तुमने ही तो मुझे interview के लिये तैयार किया था। और जब offer letter आया था; मेरा दिल तो बैठा जा रहा था। अपना शहर, अपना मुल्क छोड़ कर मैं कैसे रह पाऊँगी। पर तुम तो तब भी काफी खुश थे। कहा था " UNO में इतनी अच्छी नौकरी, मन लायक काम, और रहना भी तो आस-पास ही है; यहीं indian subcontinent में। हम आपस में contact में रहेंगे। बीच-बीच में मिलते भी तो रहेंगें। " पर मेरा मन तो तब भी नहीं मान रहा था। पता नहीं कुछ डर सा लग रहा था कि काफी कुछ छूट जाएगा।किसी भी तरह से मैं तुमसे अलग होने के लिए खुद को मना नहीं पा रही थी। नया जगह! नए लोग! और फिर काम भी तो कितना involving था; मैं कितना आशंकित थी। मेरे मन में तो आया था कि क्यों इन पचड़ों में पड़ना; सब छोड़ कर यहीं सेटल हो जाते हैं तुम्हारे साथ। उस दिन मैंने तुमसे लगभग यह कह भी तो दिया था। भले इस अंदाज में नहीं की तुम्हे कुछ जवाब देना ही पड़े। मगर तुम मुझे कितनी अच्छी तरह समझते थे अणु ! तुमने मेरे उस निवेदन को भी समझ लिया था और उसे खींच कर अचानक सतह पर लाने वाले डर को को भी। तभी तो तुमने लौटते समय मेरे पर्स में वो पर्ची डाल दी थी ; जिसने मेरे future को यह shape दिया। कितने अधिकार से तुमने कहा था -
"
ओ री नदी !
तूँ मुझमें रीतने से पहले
जग को हरियाली देती आना ।
- - -
- - -
मुझे तेरे जल की प्यास नहीं
तूँ मेरे लिए
खाली हाथ ही आ
तूँ हर तरह मेरी है
बस हृदय में प्रेम लाना ।
प्रेम :
प्रेम :
- अहं का लोप
- सीमाओं का घुल जाना
- किनारों से परे विस्तृत होते चले जाना
और निर्माण एक डेल्टा प्रदेश का
जहाँ जीवन झूमता हो
अपने अक्षुण्ण उमंग में ।
- - -
तूँ कृपणता छोड़
दोनों हाथों से उड़ेलती चल
अपना शीतल जल, अपना स्व
ताकि एक सुजलां- सुफलां धरा का निर्माण हो
अपने मिलन क्षेत्र के परितः ।
-तुम्हारा अनु
(और हाँ मुझे खुद को सागर और तुझे नदी बोलने का कोई अधिकार नहीं है। यह तो तेरा प्रेम और समर्पण ही है की मैं खुद को सागर मान बैठा )"
-तुम्हारा अनु
(और हाँ मुझे खुद को सागर और तुझे नदी बोलने का कोई अधिकार नहीं है। यह तो तेरा प्रेम और समर्पण ही है की मैं खुद को सागर मान बैठा )"
तो अनु! आज तुम उस प्रेम और समर्पण को कैसे भूल गए। कैसे भूल गए की मैं सदा -सदा से तुम्हारी हूँ। मैं जितना अपने प्यार को जानती हूँ उतना ही तुम्हारे प्यार को भी। तुम मुझसे दूर नहीं रह सकते। देखो अनु ! तुम्हारी नदी तुमसे मिलने आई है ; बिल्कुल खाली हो कर पर हाँ उसने सुजलां-सुफलां धरा का निर्माण किया है। क्या तुम बाहें खोल उसका स्वागत नहीं करोगे।
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Friday, 20 December 2013
दिल की भाषा

तुम भोले हो
दर्द से अनजान
दिल की भाषा क्या जानो ।
दिल दर्द में पक कर
समझने लगता है दिलों की भाषा-
सुन पता है
दिलों में स्पंदित दर्द;
सम्प्रेषित कर पाता है
अपनी विश्रान्त सहानुभूति-
कभी आँखों के माध्यम से
तो कभी एक हलके से स्पर्श के सहारे;
कभी उतर जाता है किसी दिल में
बिना किसी माध्यम के
या विस्तृत हो कर समाहित कर लेता है
किसी दिल को अपने दायरे में
और अपना लेता है उसे उसे
उसके दर्द के साथ ।
Friday, 17 May 2013
यादों के भँवर- Whirling memories
आ !
* * *
आज हम मिलकर रो लें,
जो यादों के भँवर ने
हमें एक दूसरे के इतना पास ला छोड़ा है ।
डूबते उतरते हुए, इस भँवर में,
कभी तो आ जाएगा हमें तैरना-
ताकि हम तय कर सकें सफ़र
अपने वजूद से तेरे वजूद के बीच का ...
* * *
याद है ?
जब एक पुल हुआ करता था
हमारे वाजूदों को जोड़ता हुआ
जिस पर बैठे रहते थे हम दोनों
कभी जरा मेरी ओर
तो कभी जरा तेरी ओर-
और उस पुल के नीचे से बह जाया करता था
जाने कितना वक़्त
शान्त निश्चल पानी की तरह ...
* * *
फिर याद है ?
वक़्त की लहरों में एक बवंडर सा उठा था
जिसने पुल के साथ -साथ
ऊँचे आसमानों तक फैले
हमारे इंद्रधनुषी ख्वाबों को भी
चकनाचूर कर दिया
और हम धम्म से आ गिरे थे
यादों के भँवर में।
फिर घिरे हुए उस भँवर में
जाने कब वक़्त ने
हमें अपनी लहरों में बहाते हुए
अपने-अपने वजूद पर लाकर छोड़ दिया ...
* * *
वक़्त अब भी गुजरता था
पर हम तट पे खड़े थे
तटस्थ,
सिमटे हुए अपने वजूद में
और आँखे गड़ी थीं
गुजरते हुए वक़्त के उस पार
तेरे वजूद की ओर।
कई बार तैर कर पार करना चाहा
वक़्त की इस दरिया को
पर यादों के वो भँवर-
साँसें उखड़ जाती थीं!
हम डूबने लगते थे! ...
और आज उसी भँवर ने जो ला छोड़ा है हमें
एक दूसरे के कहीं आस- पास
तो क्यों ना हम मिल कर रो लें
की कभी तो आ जायेगा हमें तैरना
और तय कर सकेंगे सफ़र
अपने वजूद से तेरे वजूद के बीच का ...
Let our self
Be drowned into tears
As whirls of memories
Brought us together…
Some day
We will learn to swim
Through these memories
To cross this river
Between our existence.
Once
There was a bridge
Connecting our beings.
Sitting on which
Feeling like sometimes more me
And sometimes more you.
We used to fantasize
Life like a rainbow
While beneath that
A lot of time passed
Calmly like water…
* * *
And then
A storm of vicious
misfortune
Broke that fascinating spell.
And we fall into
Vortex of memories
Which ferried us to
Banks of our own existence.
* * *
Time was still
passing
But we ware untouched by its flow..
Yearning to mingle
with your being
Across the vast river of time.
Many a times
I wanted to cross this river
But those vortex of memories
Swirling around our being
Started drowning me…
And now that
Whirling with memories
We came so close to each others being
Let our self
Be drowned into tears.
That same day
We will learn to swim
Through these memories
To cross this lapse
Between our existence...
Wednesday, 7 March 2012
Lingering Colour
Those colours of yours
Very light
But very deep
Soaked into my being
Since very beginning of journey of the life....
Which colours were those
Unaware then,
Puzzled now,
But still those lingers into my Soul
Unfaded, unveiled......
एक रंग डाला था उसने मुझपे
वर्षों पहलेVery light
But very deep
Soaked into my being
Since very beginning of journey of the life....
Which colours were those
Unaware then,
Puzzled now,
But still those lingers into my Soul
Unfaded, unveiled......
एक रंग डाला था उसने मुझपे
पता नहीं कौन सा-
लाल, पीला, हरा, सुनहला, उजला, सांवला या गुलाबी ......
बहुत हल्का सा
पर बहुत गहरा,
तब हम कहाँ पहचानते थे रंगों को,उसके सही अर्थों में
पर आज भी उसकी
ताज़ी सी खुशबू आती है,
और जब - तब
उसकी नमी मुझे सरोबार कर जाती है । ...
* * *
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