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Saturday, 21 June 2014

चाँद और समकालीन सभ्यता

चाँद और समकालीन सभ्यता











मेरे मन!
तूँ किस पिछड़ी हुई सभ्यता का हिस्सा है ?
जो चाँद में तुझे अपनी माशूका का चेहरा दिखता है;
जो उसे घंटों इस हसरत भरी निगाह से देखता है की -
वह छोटा सा चाँद तेरी आँखों में उतर आये ;
जो उसकी मध्धम सी चाँदनी में तूँ डूब जाना चाहता है ;
जो सहम जाता है तूँ -
उसे किसी दैत्याकार प्राणी के मुँह में जाता जान
जब वह खेल रहा होता है कभी
बादलों से लुका -छुपी ।

      *        *       *

आज की समकालीन सभ्यता के लिए तो चाँद "संसाधनो का पिटारा" है।
असीमित पड़तजमीजमन  को निगल जाने की हसरत से देखती हैं
- "समकालीन सभ्य आँखें"।
तूँ क्यों नहीं देख पाता है -
चौंधिया कर रख देने वाली ऊर्जा की असीम संभावनाओं को ।
तूँ क्यों नहीं कल्पना कर पाता है-
उन आलीशान कारख़ानों से निकलते धुओं की
जो चादर की तरह ढँक लेने वाले हैं चंद्रमा को
जब समकालीन सभ्यता
उस तन्हा चाँद को अपने आगोश में ले लेगी।

Images : courtsy google
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