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Saturday, 2 November 2013

व्यक्तिगत वसीयत



















ऐसे गुजरे वो दिन
जिस दिन मुझे जाना हो -
कि तेरी एक मुस्काती सी छवि
सारे दिन फंसी रहे
मन के किसी कोने में  ।

कुछ बातें कर लूँ अपनों से;
दुआ कर सकूँ उनके खैरियत की।

न कोई जल्दी हो
यहाँ से जाने  की ,
और न कोई टीस
यहाँ कुछ छूट जाने की ।

हाँ, उस रोज जरूर देख सकूँ
सूरज को उगते हुए ;
 जरूर सुने हो मैंने
पंछियों  के किसी झुंड  की चहचहाहट ;
जरूर बतियाया होऊं मैं
किसी भोले नटखट बचपन से;
          
          और पानी दे सकूँ मैं आखिरी बार
गमले में खुद से लगाये किसी पौधे में ;
           और फिर सो जाऊं
एक हल्की  सी मुस्कान के साथ।

           क्या हर दिन ऐसे ही नहीं गुजर सकता ?
क्योंकि कौन जाने  कब चलना पड़ जाये ।  


Saturday, 30 March 2013

मैं एक माटी की मूरत















एक मूरत थी मैं
माटी  की
सुन्दर सी, सलोनी सी।
मुझे हर पल बनाया गया था,
सजाया गया था तेरे लिए।
थी अमानत मैं कुम्हार की
या कहो जिम्मेदारी थी
.. फिर उस दिन जाने क्या हुआ
की अब से मैं तुम्हारी थी।
(शायद मुझपे मालिकाना हक बदल गया था। )
मैं कोई खुश तो नहीं थी
आशंकित थी,
पर एक संतोष था-
की शायद तुम्ही मुझमे
प्राण फूंक दो....

     *    *     *
तुम लेकर आये मुझे
अपने मंदिर में
मुझे विराजित किया
एक सुसज्जित आसानी पर।
- मुझमे प्राण-प्रतिष्ठा भी किया।

फिर सबने एक एक कर
आरोपित किये मुझमे
अपने अपने भगवान-
अपनी अपनी इच्छानुसार
और आगे से मुझे बनना पड़ा
सबके लिए भगवान।
सबको मिलो उसी रूप में
जैसा वे चाहते हैं ।
सबकी जिम्मेदारी
अब आगे से मेरी थी।
पर अधिकार मेरा कहाँ था
अपने उस आसानी पर भी,
उससे उतरने का तो मतलब था
मेरा पदच्युत होना ।
मुझसे तो वांछित था
की मैं प्रसाद- धूप- बत्ती
आदि जो भी मिले
ग्रहण करती रहूँ
और सब का भला करती रहूँ।


हाँ! अब मेरे पास शक्ति थी
मैं कुछ भी कर सकती थी
जब तक की उससे
हर किसी का भला हो
और मुझे न उतरना पड़े
अपने उस सुसज्जित आसनी से।
पर अब भी मेरे पास
अपनी कोई इच्छा कहाँ थी
- मैं अब भी वही मूरत थी माटी की


....प्राण-प्रतिष्ठा करके
मुझे भगवान बनाना तो
तुम्हे और तुम्हारे समाज को स्वीकार था
पर मेरे अपने प्राण के अस्तित्व को
स्वीकार करने की हिम्मत
न तुझमे थी
न तुम्हारे परिवार के किसी सदस्य में ।

Saturday, 9 June 2012

pariwar

Some times you don't want to confront hardships of life head on. you want to be free to do as per your wish to conquer them by simply ignoring them. Tired of being dictated by earthly circumstances you want to walk on your own way or simply need a halt, but then for some of your near and dear one you have to stay in the deadly journey.....


परिवार,
जो आपको जोड़ता है दुनिया से
जो आपको चलना सिखाता है
जो आपको रुकने देता ही नहीं ;
झकझोर कर उठा देता है
जब भी आपको झपकी लगे ;
सहारा देता है आपको
जब भी आप थक जाओ
ताकि आप चलते रह सको ।



Images : courtsy google
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