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Thursday, 9 April 2015

तुम नहीं हो !



तुम नहीं हो !

गुलदान कोने में सहमा सा पड़ा है।
मुझसे पूछना चाहता है -
कब आओगे ?
कब जाओगे ?
पर पूछता नहीं।

तरस गया है- जिन्दा फूलों को।
ये प्लास्टिक के फूल-
न खिलते हैं ,
न मुरझाते हैं ,
जैसे के तैसे
समय काट रहे हैं।

समय ही तो काट रहे हैं-
ये गुलदान,
ये दरों-दीवार,
और मैं भी
जैसे के तैसे  .…





Friday, 17 May 2013

यादों के भँवर- Whirling memories

आ !
आज  हम मिलकर रो लें, 
जो यादों के भँवर ने 
हमें एक दूसरे के इतना पास ला छोड़ा है । 

डूबते उतरते हुए, इस भँवर में,
कभी तो आ जाएगा हमें तैरना-
ताकि हम तय कर सकें सफ़र 
अपने वजूद से तेरे वजूद के बीच का ...

         *    *    *















याद है ?
जब एक पुल हुआ करता था 
हमारे वाजूदों को जोड़ता हुआ 
जिस पर बैठे रहते थे हम दोनों 
कभी जरा मेरी ओर 
तो कभी जरा तेरी ओर-
और उस पुल के नीचे से बह जाया करता था 
जाने कितना वक़्त 
शान्त निश्चल पानी की तरह ...

         *     *     *

फिर याद है ?
वक़्त की लहरों में एक बवंडर सा उठा था 
जिसने पुल के साथ -साथ 
ऊँचे आसमानों तक फैले 
हमारे इंद्रधनुषी ख्वाबों को भी 
चकनाचूर कर दिया  
और हम धम्म से आ गिरे थे 
यादों के भँवर में।

फिर घिरे हुए उस भँवर में 
जाने कब वक़्त ने 
हमें अपनी लहरों में बहाते हुए 
अपने-अपने वजूद पर लाकर छोड़ दिया ...

          *    *    *

वक़्त अब भी गुजरता था 
पर हम तट पे खड़े थे 
तटस्थ,
सिमटे हुए अपने वजूद में
और आँखे गड़ी थीं 
गुजरते हुए वक़्त के उस पार 
तेरे वजूद की ओर।

कई बार तैर कर पार करना चाहा  
वक़्त की इस दरिया को
पर यादों के वो भँवर-
साँसें उखड़ जाती थीं!
हम डूबने लगते थे! ...

और आज उसी भँवर ने जो ला छोड़ा है हमें 
एक दूसरे के कहीं आस- पास 
तो क्यों ना हम मिल कर रो लें 
की कभी तो आ जायेगा हमें तैरना
और तय कर सकेंगे सफ़र 
अपने वजूद से तेरे वजूद के बीच का  ... 
  




Let our self
Be drowned into tears
As whirls of memories
Brought us together…

Some day
We will learn to swim
Through these memories
To cross this river
Between our existence.

     *    *    *

Once
There was a bridge
Connecting our beings.
Sitting on which
Feeling like sometimes more me
And sometimes more you.
We used to fantasize
Life like a rainbow
While beneath that
A lot of time passed
Calmly like water…

   *    *     *

And then
A  storm of vicious misfortune
Broke that fascinating spell.
And we fall into
Vortex of memories
Which ferried us to
Banks of our own existence.

   *    *    *

Time was still passing
But we ware untouched by its flow..
Yearning  to mingle with your being
Across the vast river of time.

Many a times
I wanted to cross this river
But those vortex of memories
Swirling around our being
Started drowning me…

And now that
Whirling with memories
We came so close to each others being
Let our self
Be drowned into tears.

That same day
We will learn to swim
Through these memories
To cross this lapse
Between our existence...

Saturday, 6 April 2013

तुम आते..


वह नॉर्मली पार्टियों में नहीं जाता, बड़ा अनकम्फर्टेबल फील करता है । आज ही पता नहीं कितने  दिनों बाद दोस्तों के साथ पार्टी में आया था । दोस्त क्या! colleague थे, अचानक ज़िद कर बैठे और वह मना नहीं कर पाया।  वह खुद भी आखिर इस trauma से तो निकलना ही चाहता था। आखिर कब तक यूँ दुनियां से भागता फिरता...    यह रोहित की बर्थडे पार्टी थी । यही एक है जिससे वह इधर कुछ बोल-चाल लेता है। बात है की रोहित अपने में मस्त रहता है, ज्यादा इधर-उधर से उसे कोई मतलब नहीं। किसी के लाइफ में में ज्यादा झांकने की कोशिश नहीं करता । इसी कारण से शायद उसके चारों तरफ जो एक दीवार बन गयी है, वो रोहित अपने लिए खतरा नहीं मानती।

खैर! सारे लोग पार्टी में व्यस्त थे। वह भी रेगुलर कर्ट्सी के साथ सबसे मिला, रोहित को wish किया और धीरे-धीरे टेरिस पे आ गया। वहां एक दो चेयर लगी थी पर था कोई नहीं। अन्दर से शोर गुल की आवाजें आ रही थी । साथ में डी जे की आवाज भी आ रही थी-

गल मेरी सुन ले सोहने
बस इतना कहना है 
दिल देना है ये तुझको 
लव तुझसे करना है......

आती क्या ?
बता !
चल अपने नाल...

पर वह ज्यादा देर तक ऐसी जगहों पर रुक कहाँ पता है ।


















अब तक तो वह कहीं और जा चुका था । जहाँ शायद वो ( कौन ये तो मुझे भी नहीं पता ) उसके साथ तो नहीं थी पर उसकी आवाज शायद उस तक पहुँच रही थी -  

तुम आते 
जीवन मुस्काता 
होतीं साथ बहारें,
अपना भी
जग रौशन होता 
छंट जाते अंधियारे...

तेरी राहें
तकती आँखें
कबसे आस लगाये,
आओ हम 
तुम मिलकर प्यारी
दुनियां एक बनायें

बिन तेरे
जीवन सूना ये
हर पल तुझको पुकारे 
तुम आते 
जीवन मुस्काता 
होतीं साथ बहारें...


अन्दर से अब भी आवाजें आ रहीं थी-


from- article.timesofindia.indiatimes.com














गल्ला ना कर तूं छोरे 
देखी है तेरी जात 
दिल देना-वेना क्या है
जानूं तेरी हर बात...

ये कुड़ियां
समझतीं हैं 
तेरी हर चाल..... 

और वो अब भी पता नहीं किससे बातें कर रहा था-

समझाते
हम खुल कर तुमको
अपने दिल की बातें,
इक मौका
जो हमको देते 
लौट के जो तुम आते ...

देखो यूँ 
कब तक रूठोगे 
अब तो मान भी जाओ,
मेरी हर
इक साँस पुकारे
तुम आओ - तुम आओ...

भूल गए
यूँ छोड़ के मुझको 
बोलो किसके सहारे,
तुम आते 
जीवन मुस्काता 
होतीं साथ बहारें...... 

Sunday, 30 December 2012

मुझे ले चलो
















काफ़ी देर से वो दूर क्षितिज के उस छोड़ पर अपनी नजरें गराए खड़ी थी । मानो उस अँधेरी रात में वो आकाश के परदे के पीछे छिपे चाँद को ढूंढ़ रही हो| उसके अन्दर कई सवाल उमड़ रहे थे मगर उसे उनके जवाब नहीं चाहिए थे। उनके जवाब मिलने की उसे उम्मीद भी नहीं थी। वो बस कहीं खो जाना चाहती थी, इस दुनियाँ से दूर, क्षितिज के उस पर पार कही| अँधेरे ने उसका चेहरा छिपा रखा था| पर उसकी वो उदास तल्लीनता सबकुछ बता दे रही थी । ...

अचानक उसके पलकों के कोर पर आंसू चमक उठे| आकाश में चाँद निकल आया था| मैं स्पष्ट सुन पा रहा था वो कुछ कह रहा था -    


मेरे साथ चल 
तुझे ले चलूँ 
अपने जहाँ 
अपने डगर.... 


उसके भी कंठ हिले| हालांकि होंठ यथावतस्थिर ही थे और मैं चेहरे पर कोई भाव भी लक्षित नहीं कर पा रहा था लेकिन मेरे कर्णपटलों को भेदती हुई एक तीक्ष्ण सी आवाज मैं सुन पा रहा था-  
  
                      तेरे साथ हूँ 
                      मुझे ले चलो 
                      चाहे जहाँ 
                      चाहे जिधर ....।।  

                          *        *     *

                      कई दर्द हैं....
                      बेदर्द हैं 
                      अपने सभी 
                      रिश्ते यहाँ ।
                      मुझे ले चलो 
                      जहाँ ग़म न हो
                      अपने- पराये 
                      न हों जहाँ ।।

      
                      जहाँ रह सकूँ 
                      बिना खौफ़ के 
                      सब रास्ते 
                      हों खुले जहाँ ।
                      जहाँ बन सकूँ 
                      इतरा सकूँ 
                      ज्यूँ बाग़ - वन 
                      में तितलियाँ ।। 

      
                      हर आदमी 
                      इन्सान हो,
                      कुंठित नहीं 
                      व्यवहार हो ।
                      जीवन सरल 
                      अविराम हो ,
                      ना घात  ना 
                      प्रतिघात हो ।।

                           *     *     *

                      पग - पग पे हैं 
                      यहाँ बंदिशें,
                      हर ओर है
                      चुभती नज़र ।
                      हर रास्ते 
                      कांटे उगे,
                      छलनी हृदय 
                      जाऊं किधर ।। 

                      ..........  तेरे साथ अब 
                                  मुझे ले चलो 
                                  चाहे जहाँ 
                                  चाहे जिधर।
अब तक चाँद उतर कर जमीन पर  आ चूका चुका था ।  उसने एक बार फिर आवाज दिया ... 

                                                      ......मेरे साथ चल 
                                                            तुझे ले चलूँ 
                                                            अपने जहाँ 
                                                            अपने डगर.... 

तभी मैं क्या देखता हूँ की जमीन में अपने आप एक दरार बनता है और वो दोनों धीरे- धीरे उसमे उतर जाते हैं । आकाश में एक बार फिर निष्तब्ध अँधेरा छा जाता है । 

अचानक मैं तन्द्रा से बहार बाहर आया  । देखा धूप काफ़ी चढ़ा चुकी थी । सामने मेज पर अख़बार पड़ा था और उसमे से वही लड़की  बाहर झांक रही थी । ऊपर शीर्षक लिखा था "और वो चली गयी..."












Saturday, 17 December 2011

kuchh to bolo!


मैं तो सदा तुम्हारे साथ हूँ ,
तुम अपनी आँखें तो खोलो ,
कोशिश तो करो तुम
मुझे देखने की , महसूस करने की .....


हवा  जो  तुझे सहला जाती है ,
वो तेरे स्पर्श को आकुल ,
मैं ही तो हूँ ;
पक्षियों की चहक  में, व्याकुल
मैं ही तो तुझे पुकार रही हूँ ;
मैं ही तो रोज आती हूँ
तुझे देखने
आसमान में
बनकर चाँद तारे.........

तुम जिन फूलों को
मेरी चोटियों में गूँथ देते थे
मैं आज उन्ही में बस कर
तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ,
की कभी तुम इधर आओ
और मैं टूट कर तुम पर बिखर जाऊं.......

पर तुम तो खोए हो कहीं शुन्य में
सारी  दुनिया को भूल कर ;
जैसे रूठे  बैठे हो |



हाँ, तुम्हे हक़ है
मुझसे रूठने का
मुझसे शिकायत करने का
तुम चाहो तो
मुझे बेवफा कहो,
गलियां दो मुझे
नफ़रत करो मुझसे........
पर यूँ सब छोड़ कर न बैठो,
कुछ तो बोलो ! .......

वरना मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊंगी ,
मेरी रूह तड़पती रहेगी ,
मेरा अंतस बैचैन रहेगा |


Images : courtsy google
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