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Thursday, 23 April 2015

उलझन

लिखने को तो जी बहुत कुछ चाहता है
पर डर लगता है
कहीं शब्दों की झाड़ियों में
जिंदगी उलझ कर न रह जाए।













read this in the context of my previous blog post

Thursday, 16 October 2014

चाह


 वो जो मुझे नहीं
मेरे प्यार को पाना चाहे …
मुझे जानने भर में न उलझ कर
मुझे समझना चाहे…


Saturday, 21 June 2014

चाँद और समकालीन सभ्यता

चाँद और समकालीन सभ्यता











मेरे मन!
तूँ किस पिछड़ी हुई सभ्यता का हिस्सा है ?
जो चाँद में तुझे अपनी माशूका का चेहरा दिखता है;
जो उसे घंटों इस हसरत भरी निगाह से देखता है की -
वह छोटा सा चाँद तेरी आँखों में उतर आये ;
जो उसकी मध्धम सी चाँदनी में तूँ डूब जाना चाहता है ;
जो सहम जाता है तूँ -
उसे किसी दैत्याकार प्राणी के मुँह में जाता जान
जब वह खेल रहा होता है कभी
बादलों से लुका -छुपी ।

      *        *       *

आज की समकालीन सभ्यता के लिए तो चाँद "संसाधनो का पिटारा" है।
असीमित पड़तजमीजमन  को निगल जाने की हसरत से देखती हैं
- "समकालीन सभ्य आँखें"।
तूँ क्यों नहीं देख पाता है -
चौंधिया कर रख देने वाली ऊर्जा की असीम संभावनाओं को ।
तूँ क्यों नहीं कल्पना कर पाता है-
उन आलीशान कारख़ानों से निकलते धुओं की
जो चादर की तरह ढँक लेने वाले हैं चंद्रमा को
जब समकालीन सभ्यता
उस तन्हा चाँद को अपने आगोश में ले लेगी।

Friday, 20 December 2013

दिल की भाषा











तुम भोले हो
दर्द से अनजान
दिल की भाषा क्या जानो ।

दिल दर्द में पक कर
समझने लगता है दिलों की भाषा-
सुन पता है
दिलों में स्पंदित दर्द;
सम्प्रेषित कर पाता है
अपनी विश्रान्त सहानुभूति-
              कभी आँखों के माध्यम से
              तो कभी एक हलके से स्पर्श के सहारे;
कभी उतर जाता है किसी दिल में
बिना किसी माध्यम के
या विस्तृत हो कर समाहित कर लेता है
किसी दिल को अपने दायरे में
और अपना लेता है उसे उसे
उसके दर्द के साथ ।   

Wednesday, 16 October 2013

आसन्न खतरा


















अंधेरों की सनसनाहट
संगीत नही,
भयानक शोर
जो फाड़ डाले कान के परदों को -
अचानक थम जाती है ।

 …शायद कोई आसन्न ख़तरा
घुल रहा है हवाओं में ।

… के शायद कोई नाग निकल पड़े झाड़ियों से;
या और कुछ ।

… के शायद मुझे भी चुप हो जाना चाहिए ;
इस विलाप को बंद करके
सतर्क हो जाना चाहिए
उस आसन्न खतरे के प्रति। 
 

Sunday, 27 May 2012

Hain Mere Bhi Kuchh Armaan...


नहीं , मैं कुछ  महसूस  नहीं करता ,
मुझे कैसा भी नहीं लगता ।

कोई मुझे देखे
न  देखे 
देख  के  न  देखे .... मुझे क्या ।
मैं थोड़े ही इस  उम्मीद में हूँ 
की मुझे ढूँढती होगी कोई नजर ,
या अनायास  ही चमक  उठेगी किसी की नज़र 
मुझे पहचान  कर ,
मेरी ओर उठेगी कोई  निगाह या फिर 
बस  यूँ ही, औपचारिकता वश  .....

मुझे थोड़े इंतज़ार है 
किसी जाने अनजाने पुकार का 
जो मुझे बाहर खींच  लाये 
इस  एकाकीपन  से.....  ।

क्यूँ मैं शामिल  करना चाहूँगा 
किसी को अपने ख्वाबों में 
क्यूँ साझा करना चाहूँगा किसी से 
अपनी खुशियाँ , अपने ग़मो -दर्द 
मैं चुपचाप अकेले ही चलने का आदि हूँ अबतक 
क्यूँ मैं तलाशूंगा कोई साथी , कोई हमसफ़र .....
हाँ, सब चले जाओ 
मुझे अकेला छोड़ कर .....।

*     *     *
कसक  उठती है इस  दिल  में तो क्या ?
तड़प उठता है ये दिल  तो क्या ?
ये दिल  रोता  हो तो क्या ?
बंद करके इसे किसी ताबूत में ,
दफ्न कर दूंगा कहीं सीने में ....
दर्द  इस  दिल  के
इस  दिल  को  ही सहने होंगे,
...... क्योंकि मैं कुछ महसूस   नहीं करता ।


Images : courtsy google
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