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Saturday, 24 January 2015

।। वासंती ।।

            टूटे तार
            खंड-खंड स्वर
            राग विखंडित
            क्षिप्त रागिनी
ऐ मृदुले! जीवन के सुर-
            संयोजित कर दे ।।

           टूटे-फूटे छंद
            भाव बिखरे-बिखरे से
            रस की सरिता सूखी सी
            सब शब्द अनमने
            भटका हुआ कहन
            कथन सब बासी-बासी
            काव्य प्रवाह शून्य
            जीवन पर्यन्त उदासी
सरस! सुकोमल शुद्ध भाव से
            हृदय ताल भर दे ।।

            लोक-जगत
            सब विद्रूप अंकित
            सब दिक् - मौसम
            धूसर रंजित
            दिवस-निशा
            सब अलसाये से
दे! अब कुछ
            जागृति  के क्षण दे


वासंती ! इन नयनों में
            सौंदर्य बोध भर दे ।।



Sunday, 4 January 2015

चांदनी के नशे में

यूँ चांदनी पीते-पीते हम तुम
किस नशे में उड़ चले हैं
चाँद तक
तारों तक
तारों के एक गुच्छे से  दूसरे गुच्छे तक
कई मन्दाकनियों को पार कर
ब्रह्माण्ड के एक छोड़ से दूसरे छोड़ तक.…












आओ न !....
यहीं, इस मंदाकनी के किनारे
नव-तारों के बागीचे के बीचो-बीच
एक प्यारी सी कुटिया बनाते हैं।
तुम हर सुबह
मेरे केशों में सजाने को
ओस बिछे घाँस पर से
टूटे तारे चुन कर लाया करना …
मेरे केशों में
मालती के फूल से वो तारे
तुम्हे बहुत पसंद आएंगें न …

ऐसे ही किसी दिन
तुम रास्ते पर बिखरे
कुछ छुद्र ग्रह बटोर लाना
मैं उनको कूट-पीस कर
हथेलियों में मेंहँदी रचा लूँगी
और आँगन की लताओं पे लगे
रक्तिम तारों के रस से
पावों में महावर भी लगा लूँगी  ...
मेरी दोनों सूनी कलाइयों के लिए
वृहस्पति और शनि के वलय मँगवा लेना
और ध्रुव तारे का एक टीका भी बनवा देना … 
फिर उस ढलती साँझ को
सूरज की लाली से
मेरी कोरी माँग भर देना …
मुझे सदा सुहागन का आशीर्वाद देने
सप्तर्षि-गण भी आएँगें न ...


फिर उसी रात
दुग्ध मेखला में लिपटी
लाज से दोहरी
जब मैं तुम्हारे पास आऊँ
तो जुगनू सा टिमटिमाता चाँद
जो तुमने कुटिया के छत से टाँक रखा है
मेरी हथेली में रख देना …
मैं उसे तुम्हारा प्रथम उपहार मान कर
सहेज कर अपने पास रख लूँगी
ताकि चाँदनी का यह नशा
कभी न उतरे। है न …




 

Sunday, 23 June 2013

प्रलय-प्लवन




चुप!
अब केवल मैं बोलूँगी ।

बहुत हो गया कहना-सुनना 
- सुन मेरी अब सिंह-गर्जना ।

"खड़े-खड़े बस बातें करना"
 "सिर से पाँव स्वार्थ में डूबे 
धरे हाँथ पर हाँथ विचरना "

-खिन्न मंद मैं हँस देती थी ।
मगर बाँध अब टूट चूका है-
अट्टहास मम सुन कराल यह 
तेरे पाँव उखड़ जाएँगे ;
खिसकेगी कदमों के नीचे 
धरती, अम्बर भी उलटेगा ; 
प्रलय-प्लवन हहरेगी मग में 
भागो कहाँ किधर भागोगे।

शांति ?
शांति नहीं अब, 
दया नहीं अब,
क्षमा नहीं, वात्सल्य नहीं अब;
अपना हक़, अपनी निर्मलता
माँगे मुझको मिली नहीं जब ।
मेरे जीवन की धारा को 
जीवित नहीं जब तुमने छोड़ा ।
अब इस विप्लव के प्रवाह को 
शिव भी स्वयं न रोक सकेगा ।
मद! लोलुपता!! अकर्मण्यता!!!
का हिसाब तुम अब पाओगे । 

भविष्य-
नहीं जानती मैं बस 
इतना मुझको अभी ज्ञात है 
मुझसे इतर भविष्य नहीं है 
ना कल था, न वर्तमान है ।
जीवन-क्षय की असह वेदना 
पीड़ित मुझको भी करती है 
जीवन-संतुलन के हित यह
द्रवित-अस्मिता की उफान है ।

गुंथा हुआ है एक सूत्र में 
जीवन का हर एक रूप यह 
गर तोड़ोगे इस तंतु को 
कंकर हो जीवन बिखरेगा 
नाश - नाश 
बस दारुण दुःख ही 
इसका पारितोषक पाओगे ।
  


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Disclaimer: My intention is not to offend those affected by such a disaster. I prey for their well being and recovery. This poem is concerning about reason behind such disaster.
  






Saturday, 23 February 2013

झील और पत्थर


अभी-अभी सुनीता रूम से बाहर गई थी की मैं रूम में आया, देखा टेबल पर एक दो पुरानी  कॉपियाँ पड़ी थी।  एक कॉपी से एक फ़ोटो बाहर झाँक रहा  था।  मैंने फ़ोटो  निकालने के लिए कॉपी खोला तो पहचाने से अक्षरों में कुछ लिखा था .....


दो पल की मुलाकात,
और
वो मुझमे उतर गया
झील में गिरे
किसी पत्थर की तरह ;

फैलते रहे मेरे वजूद पर
उसकी यादों के घेरे
जैसे उस झील में तरंग;

और उस पेज के साथ रखी थी मेरी वही फ़ोटो जो मैंने सगाई से पहले उसके छोटे भाई के हाँथों उसे भिजवाई थी।  मैं उन पुरानी यादों में खोने ही वाला था की तभी सुनीता कुछ बड़बड़ाती हुई अन्दर आयी-
 "जहाँ देखो मुझे ही सारी तैयारी करनी पड़ती है, ये भी नहीं की आज ही ऑफिस से थोड़ा जल्दी आ जाते ।पता  नहीं उन्हें आज का दिन याद भी है या नहीं "

अचानक मुझे देख कर वो चौंक गयी। फिर मुझे लगा वो कुछ सिमटती सी जा रही है।  मैं गेस नहीं कर पा रहा था की वो नाराज है या शरमा रही है....         




This poem may be considered as my hindi rendering of a post by @iBeingMe
circles

Thursday, 21 February 2013

मंच से तब लौट आना


मैं चला अब
बांध के सामान अपना ;
आप आओ
मंच पर मेले लगाओ ।

आप की महफ़िल
बड़ी गुलज़ार होगी ;
है दुआ कि
आप जग में जगमगाओ ।

वक़्त आने पर मगर जो
दर्द की फ़सलें उगेंगी
काट कर उनको
कमर से बांध लेना ;
(यह खजाना साथ रखना
पर किसी को मत दिखाना )।

वक़्त जब फिर आपको
नेपथ्य के पीछे पुकारे ;
साथ ले उस दर्द को
मंच से तब लौट आना ।



*          *          *



My time's over
Come on the stage
It's whole yours.

Yours' will be

The glorious performance.
Spreading ageless delight
To each and every place.

At times
Waves of sorrow
will engulf your joy;
Let it not
Hold your way.
Unfold it and fold it
To put safely
Within your heart
Concealing from others.

When time
Takes it own tern
To call you off the stage
This parcel
Will your only belonging
And true treasure.




Sunday, 13 November 2011

jagane se kuchh der pahale

जगाने   से  कुछ  देर  पहले 


जाने कबसे,
देखा नही - खुले  गगन को,
नजरें न फेरी- जमीं की ओर |

भूल गया-
की सूरज कब आता है,
कब जाता है,
की पंक्षी गाते भी हैं,
की फूल खिलते भी हैं,
की घाँस का स्पर्श कैसा होता है,
की कैसे बचपन
सबकुछ भूलकर रोता है,
फिर अगले ही पल खिलखिलाता हुआ भाग जाता है |

सुना नहीं -
पेड़ों के पत्तों की पुकार,
जब बुलाया था उसने
रुकने को दो पल अपने साये में;
बारिश के बूंदों की रिमझिम,
जब भिंगोया था उसने
खिड़की के शीशों को, छतों को, दीवारों को |

पता नहीं
की नदी
(जिसपर बने पुलिए से हर रोज गुजरता हूँ)
किस ओर जाती है;
की हमारे फ्लैट के बांकी  आधे हिस्से में
(जिसका दरवाजा मेरे दरवाजे के ठीक सामने खुलता है)
कौन रहता है |
*     *    *

आज जगाने से कुछ देर पहले
मै खड़ा था नदी के ऊपर बने पुलिए पर ,
पंछियों के चहक से मेरा एकांत गूंज रहा था,
मै पूरे  आकाश भर में घूम रहा था,
या फैलता जा रहा था;
तभी मुझे छुआ सूरज की लाल किरणों ने
और नीचे  एक स्मित मुस्कान के साथ
झिलमिला उठी नदी |

*   *   *

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|| -आज के मशीनी जीवन के खिलाफ एक मोर्चा .......स्वपनों  के माध्यम से || 
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Images : courtsy google
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