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Saturday, 7 May 2016

दो कवितायेँ

              (1)

हालाँकि मुझे अधिकार नहीं है
फिर भी मैं चाहता हूँ
की तुम आजादी के लिए प्रयत्न करो
इसलिए नहीं की सब ऐसा करते हैं,
किसी फैसन में बने रहने के लिए नहीं
चलन की गुलामी में नहीं ।
पंख खोलने से पहले
अपनी आँखे खोलो
और दुनिया को खुद नजर से देखो
उधार के नजरिये से नहीं ।

      *      *      *

         
            (2)

सोंचता हूँ
की मैंने क्या -क्या सोंच रखे थे
तुम्हारे लिए....
फिर सोंचता हूँ
की क्या! मुझे अधिकार था
तुम्हारे लिए कुछ सोंचने का ?
और फिर सोंचता हूँ
क्या मैंने वास्तव में तुम्हारे लिए सोंचा था,
या वो मेरे ही शौक थे ।


Thursday, 18 July 2013

मुक्त-जीवन

मेरे अंक मे
तेरे प्यार की थाती नहीं
मेरे कल का सहारा नहीं
एक नया जीवन है
जो मुक्त है
भूत की परछाइयों से
और भविष्य की अपेक्षाओं से।


Thursday, 12 January 2012

Parinda परिंदा

|| परिंदा ||
था वो एक परिंदा
पर समझता रहा खुद को पतंग,
सीखा था उड़ना उसने
बंध कर डोर की सीमा में,
इशारों पे पतंगबाज के ;
काँप उठता था कल्पना करके 
डोर से अलग होने के बाद की अपनी गति |

   *         *         *

उस दिन जब अचानक
नियति ने उससे छीन  लिया
डोर का सहारा
और धकेल दिया खुले आसमान में ;
उसने पाया एक नया आकाश ,
एक नया सहारा, एक नया एहसास ;
आज वो आजाद था उन्मुक्त गगन में 
उड़ने को अपनी मर्जी  से
ऊपर, ऊपर और ऊपर,
और स्वच्छंद था नीचे जाने को भी,
आज वो उत्तरदायी था तो सिर्फ अपने प्रति,
न  की किसी  अनजाने पतंगबाज  के प्रति |  
   *       *       *


Images : courtsy google
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