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Saturday, 7 May 2016

दो कवितायेँ

              (1)

हालाँकि मुझे अधिकार नहीं है
फिर भी मैं चाहता हूँ
की तुम आजादी के लिए प्रयत्न करो
इसलिए नहीं की सब ऐसा करते हैं,
किसी फैसन में बने रहने के लिए नहीं
चलन की गुलामी में नहीं ।
पंख खोलने से पहले
अपनी आँखे खोलो
और दुनिया को खुद नजर से देखो
उधार के नजरिये से नहीं ।

      *      *      *

         
            (2)

सोंचता हूँ
की मैंने क्या -क्या सोंच रखे थे
तुम्हारे लिए....
फिर सोंचता हूँ
की क्या! मुझे अधिकार था
तुम्हारे लिए कुछ सोंचने का ?
और फिर सोंचता हूँ
क्या मैंने वास्तव में तुम्हारे लिए सोंचा था,
या वो मेरे ही शौक थे ।


Sunday, 12 October 2014

अहसास


एक अहसास
तेरे पास होने का
सिहरन
तेरी सांसों से छूने सा
खुशबू सी
हवा में यूँ फैल  गयी
चटक सा गया हो
कोई फूल अधखिला

जाने क्या था
वो झुकी पलकों सा
चाँद के पार चला
कोई पंछी मनचला
जैसे कुछ कहने सा 
वो पलक उठने सा

सूरज से, किरणों से
रौशन था  सवेरा
इधर से उधर -
यहाँ से वहां
तूँ जैसे फैल रही
मैं  तुम्हारा हूँ
जैसे तुम हूँ
तुम्ही हूँ।

Saturday, 10 May 2014

उपासना

तुझे मेरे लिये नदी बनाना होगा प्रिये  !
उनका बहाव भी
और कल-कल स्वर भी ;
फूल भी
पत्ते भी
डालियाँ भी
और पूरा का पूरा पेड़ भी ;
घाँस भी
उनपर पड़ी ओस की  बूँदें भी
और उनमे प्रतिबिम्बित स्वर्ण रश्मियाँ भी;
रात भी
चाँद भी
और चांदनी भी ;
धूप  भी 
सूरज भी
उषा में  उसका आगमन भी
और संध्या में  उसका प्रस्थान भी ;
हवा भी
बादल  भी
और बारिश भी ;
पर्वत भी
उसकी ऊंचाई भी
और उसपर फैली बर्फ की चादर भी;
झील भी 
उसमे प्रतिबिम्बित दृश्य भी
और उस झिलमिल लय को तोड़ कर मुस्कराता कमल भी ;
और भी न जाने कितना कुछ
क्योंकि मैं इन सब रूपों में  आज तक तुम्हे ढूंढता आया हूँ।
क्योंकि इन सब रूपों में
मैं तुम्हारी उपासना  करना चाहता हूँ।

 

Thursday, 12 January 2012

Parinda परिंदा

|| परिंदा ||
था वो एक परिंदा
पर समझता रहा खुद को पतंग,
सीखा था उड़ना उसने
बंध कर डोर की सीमा में,
इशारों पे पतंगबाज के ;
काँप उठता था कल्पना करके 
डोर से अलग होने के बाद की अपनी गति |

   *         *         *

उस दिन जब अचानक
नियति ने उससे छीन  लिया
डोर का सहारा
और धकेल दिया खुले आसमान में ;
उसने पाया एक नया आकाश ,
एक नया सहारा, एक नया एहसास ;
आज वो आजाद था उन्मुक्त गगन में 
उड़ने को अपनी मर्जी  से
ऊपर, ऊपर और ऊपर,
और स्वच्छंद था नीचे जाने को भी,
आज वो उत्तरदायी था तो सिर्फ अपने प्रति,
न  की किसी  अनजाने पतंगबाज  के प्रति |  
   *       *       *


Images : courtsy google
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