Monday, 21 September 2015

मलवा

अरे ! क्यों गिराते हो दीवारों को?
इनमें भी एक जीता जागता जीवन है!

क्या कहा - ?
सड़न है, दुर्गन्ध आती है,
सीलन है, दीवारें जर्जर हैं ,
कई जीवन कैद हैं इनके भीतर,
कई जीवन दफन हैं इनके नीव तले !

तो दो हथौड़ा-
मैं भी तुम्हारे साथ हूँ-
नेस्तनाबूत कर दें सब दीवार, सब मकान,
पर पहले इतना तो बता दो-
इसके बाद क्या करोगे ?
यहाँ नया महल बनाओगे,
नई इमारत खड़ी करोगे,
या सुन्दर सी कुटिया बनाओगे ?
या फिर बनाओगे यहाँ सुन्दर बगीचा, या समतल मैदान ?


....... अरे सुनो !
कम से कम ये मालवा तो साफ़ करते जाओ......!

Wednesday, 2 September 2015

दिल्ली से बिछुड़ते समय

मैं नहीं चाहूँगा 
की दिल्ली मेरे रग रग में बहे 
जरूरत बनकर।

मैं चाहूँगा की जैसे 
यादों की खुसबू बनकर 
मौके बेमौके महकते हैं 
देहरादून और नागपुर। 
या फिर दोस्तों के निश्चिन्त ठहाकों की तरह
जैसे कानों में कभी कभी गूंज जाता है हैदराबाद। 
वैसे ही किसी भूले बिसरे गीत की तरह 
मेरे पल दो पल को झनकाति हुई 
गुजर जाए ये दिल्ली....

क्योंकि जरूरत और मोहोब्बत
दो अलग अलग चीज हैं 
मोहोब्बत आजादी है 
जबकि जरूरत गुलामी....

Images : courtsy google
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