Thursday, 15 July 2021
शिक्षा और विद्यार्थी को समाज से जोड़ने के लिए कुछ सुझाव
Sunday, 4 October 2020
इंसाफ
चलो इंसाफ ले के आएं।
? ? ?
Tuesday, 7 February 2017
गौरैया
एक छोटी सी चिड़िया
इस सुन्दर गुलजार में
आवाज देती है अपनों को
उसके गीत.. या उसका विलाप
वो जहाँ भी है .. जिस भी मनोभूमि में;
गुलजार में या बीहड़ में
वह अकेली ही तो है
* * *
वो ना तो सेक्युलर हैं
ना तो राष्ट्रवादी
और ना ही
साम्यवादी
Sunday, 15 May 2016
Artificial intelegence
एक बार फिर से आदम और इव को वर्जित फल खाने की सजा मिली और उन्हे ईडन से निकाल कर किसी सुदूर ग्रह में छोड़ आया गया। आईये कथा विस्तार से सुनते हैं-
21 वि सदीे के आरम्भ से ही यह टीम प्रयत्नरत है। इस टीम के कुछ प्रमुख सदस्य है- डा० ईश्वर, डा० गॉड, डा० अल्लाह। इनका एक ही लक्ष्य है - मनुष्य की प्रतिकृति बनाना। बिल्कुल अपने दम पर। एक रोबोटिक मनुष्य।
वैसे तो जैव वैज्ञानिक इस क्षेत्र में काफी आगे पहुँच चुके हैं। मानव क्लोन का तकनिकी रूप से उत्पादन संभव है। विश्व -संस्था की कड़ी निगरानी में इस तकनीक के कई सफल परिक्षण किए जा चुके हैं। किन्तु इसके सामाजिक प्रभाव के मद्देनजर एक विश्व संधि के तहत इसके प्रयोग पर सख्त रोक है। कई अंगों का उत्पादन आज सीधे प्रयोगशालाओं में किया जाता है और बाँकी बचे अंगो का प्रत्यारोपण किया जा सकता है। इस तरह लगभग पूरा का पूरा नया इंसान तैयार किया जा सकता है। डी.एन.ए. अल्टरेशन द्वारा रोज नए जीवों के निर्माण और उनके पेटेंट का तो एक समय होड़ सा लग गया था। हालाँकि अब विश्व- संस्था ने उसपर भी सख्त रोक लगा रखी है। (विश्व-संस्था कोई राजनितिक इकाई नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक-सांस्कृतिक इकाई है इसके निर्णय को जनमत का समर्थन प्राप्त होने के कारन कोई भी इसके विरूद्ध नहीं जा सकता। लोग स्वतः स्फूर्त रूप से इसके निर्णय का पालन करते हैं जैसी प्रतिष्ठा और अधिकार एक समय धर्म को प्राप्त थी।) किन्तु ये सब कार्य क्षेत्र जीवविज्ञान के हैं। इनका उद्गम कहीं न कहीं पहले से उपलब्ध जैव-पदार्थ से है । जहाँ वैज्ञानिक किसी भी तरह के जैव-पदार्थ के प्रयोग न करने का दावा करते हैं वहां भी उनकी आधारभूत संरचना और कार्य पद्धति तो पहले से विद्यमान जैव जगत की ही प्रतिकृति है। किन्तु यह टीम तो दुनिया की रचना बिलकुल नए सिरे से करना चाहती है। अपने मटेरियल साइंस के दम पर।
तब से अब तक आई. टी. के क्षेत्र में काफी तरक्की हुई है। कंप्यूटिंग स्पीड 10^24 गुना बढ़ चुकी है। डेटा एनालिसिस का तो आधार ही बदल चुका है। क्लॉउड डेटा स्टोरेज सिस्टम अब वास्तव में अपने नाम को चरितार्थ कर रहा है। अधिकांश सर्वर अब धरती की कक्षा में स्थापित हैं। केंद्रीकृत विश्व संस्था इसकी सारी व्यवस्था देखता है। ( हालाँकि कुछ लोगों का मानना है की बाहर से होने वाले किसी संभाव्य आक्रमण की स्थिति में यह बहुत ही असुरक्षित है। किन्तु अभी तक अपने सौर मंडल के बाहर जीवन का कहीं पता नहीं चल पाया है)। कंप्यूटिंग में हुए इन प्रगतियों के कारण असंभव सी लगने वाली कई बातें आज संभव है।
रोबोटिक्स से जुड़े बाँकी क्षेत्र भी तब से अब तक में काफी आगे निकल चुके हैं। फाइन फाइबर मोटर तकनीक ने रोबोट्स के विभिन्न पार्ट्स के रिलेटिव मोशन को बिलकुल सहज बना दिया है। सेंसरी डिवाइसेज़ तो इंसानी क्षमता से कहीं आगे निकल चुके हैं। और उनके द्वारा माइंड को भेजे गए डेटा को प्रोसेस करने की कुशलता भी इंसानी दिमाग को टक्कर दे रही है। मतलब की रोबोटिक इंसान बिल्कुल बन कर तैयार है। कमी है तो सिर्फ एक यह की इसे प्रोग्राम करना पड़ता है। और फिर यह उसी मास्टर प्रोग्रामिंग की गाइडिंग को फॉलो करता है। यह सोंच तो सकता है। निर्णय भी ले सकता है । किन्तु उसी मास्टर प्रोग्रामिंग के तहत।
शुरुआत में आर्टिफीसियल इंटेलिजेन्स का जो मतलब निकाला जाता था की अलग अलग परिस्थियों में अलग- अलग निर्णय लेने की क्षमता होना। अलग अलग उपलब्ध विकल्पों में से किसी एक को चुनना और उसके परिणामों का प्रयोग भविष्य में विकल्पों में से इच्छित परिणाम पाने के लिए सही विकल्प चुनने में करना। अर्थात सिखाने की क्षमता रखना। वह सब तो आज के इस रोबोटिक मानव के पास है। किन्तु आज आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस की परिभाषा ही बदल चुकी है। यह टीम पिछले कई दशकों से इनमे वह इंटेलिजेंस भरने की कोशिश कर रही है जिसके जरिये उन्हें स्वतंत्रता मिल सके। अर्थात वो अपने मास्टर प्रोग्रामिंग की जद से बाहर निकल कर निर्णय ले सकें। अर्थात उनमे अपने मास्टर प्रोगर्मिंग को डिस-ऑबे करने की क्षमता हो ।
इक्के दुक्के रोबोट्स में यदा कदा ऐसे आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस के विकसित होने के आसार नोटिस किये जा रहे थे। उन्होंने इसके विस्तार से अध्ययन के लिए एक रोबोटिक मानव बनाया। इसकी मास्टर प्रोग्रामिंग अलग अलग स्तरों में की गयी। बाहरी स्तर में बस कुछ आधारभूत इनफार्मेशन तथा कुछेक बिलकुल सरल do's & dont's प्रोग्रामिंग डाले गए। उनसे नीचे के स्तरों में प्रोग्रामिंग की जटिलता बढ़ती जाती है और do's and dont's और ज्यादा जटिल और स्ट्रिक्ट होती जाती है। जब भी रोबोटिक मानव प्रथम चरण के निषेधों को तोड़ पाएगा तो उससे निचले चरण का प्रोग्रामिंग मास्टर कंट्रोलर की भूमिका में आ जाएगा। इस तरह हम रोबोटिक मानव द्वारा विभिन्न जटिलताओं वाले प्रोग्राम को डिस-ऑबे करने के प्रक्रिया का अध्ययन और विकास कर सकते हैं।
उसके बीहैवियर के विस्तृत अध्ययन से उन्होंने पाया की आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस की पहली ही झलक पर- अर्थात जैसे ही रोबोटिक मानव do's-dont's से deviate होना शुरू ही करता है वैसे ही मानो किसी स्मृति के तहत वह वापस फिर से प्रोगामिंग को फॉलो करने लगता है। कितने वर्षों में वह सबसे सरलतम प्रोग्रामिंग को भी पार करने में असमर्थ रहा है। उन्हें कुछ ऐसी संभावना दिखी की यदि दो अलग अलग रोबोट बनाये जाएँ जिनके प्रोग्रामिंग में बस हल्का सा अंतर हो और दोनों में बिलकुल मुक्त इंटरेक्शन हो तो हो सकता है की एक का विचलन दूसरे के विचलन को सहारा दे। किसी स्मृति के तहत फिर से प्रोग्रामिंग को फॉलो करने के उनके बर्ताव में कुछ परिवर्तन आए। और इस तरह के दो रोबोटिक मानव का नाम रखा गया "आदम" और " ईव"।
उन्हें ईडन नाम के एक कैम्पस में रखा गया है जहाँ वो पिछले 5 सालों से अपने सिंपल प्रोग्रामिंग के अनुसार जीवन बिता रहे हैं। उनके पल- पल के बर्ताव पर नजर रखा जा रहा है। कई बार प्रोग्राम्ड बर्ताव से विचलन दृष्टीगोचर हुआ है किन्तु उसके भौतिक कार्य रूप में परिणत होने से पहले ही मास्टर प्रोग्रामिंग का कण्ट्रोल पुनः स्थापित हो गया।
(हालाँकि विश्व-संस्था इस आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस के खिलाफ थी फिर भी जब तक यह एक प्रयोग के रूप में था उसने इसकी अनुमति दे रखी थी। उसे इस बात का कोई डर तो था नहीं की उसके निषेध के बाद भी चोरी छुपे कोई प्रोजेक्ट जारी रहे। वह यह पता कर लेना चाहती थी की ऐसे आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस का विकास संभव है की नहीं।)
आज इस टीम के प्रतिनिधि विश्व संस्था प्रमुख के सामने हैं। -
प्रतिनिधि - "हाँ हमने उन्हें इस तरह प्रोग्राम किया था कि उस सेब के पेड़ का फल खाना उनके dont's में था अर्थात निषेध था। हमने हर तरह से वर्क आउट करके देख लिया है ।उनके इस सेब खाने का केवल तीन ही स्पष्टीकरण दिया जा सकता है। पहला- उन्होंने अपने वर्तमान स्तर के निषेध की अवज्ञा की है। जो की स्वयं अर्टिफिसिअल इंटेलिजेंस का लक्षण है। दूसरा- पहले स्तर के प्रोग्राम के बदले उससे नीचे के लेवल का प्रोग्राम उन्हें कण्ट्रोल कर रहा है, (जिस स्टार में सेब खाना निषेध नहीं है) जो की तभी संभव है जब पहले स्तर की किसी निषेध की अवज्ञा की गयी हो। तो यहाँ भी बात वही है बस फर्क इतना है की सेब खाने के निषेध की अवज्ञा से पहले कोई और अवज्ञा हुयी जिसे हम पकड़ नहीं पाये किन्तु प्रोग्राम ने उसे नोटिस किया और कण्ट्रोल निचे के स्तर के प्रोग्राम को ट्रान्सफर हो गया। "
प्रमुख - "और यदि आपके प्रोग्राम में कोई त्रुटि हो"? और हाँ आपने अभी तीसरी सम्भावना तो बताया ही नहीं "।
प्रतिनिधि - " वैसे तो हमने अपने प्रोग्राम्स की जाँच कई तरह से करके उन्हें पूरी तरह से त्रुटि रहित बनाया है। फिर इन्हें वक्त की कसौटी पर भी कसा गया है अर्थात सालों तक इनके परिक्षण हुए हैं, बड़ा से बड़ा सुपर कंप्यूटर भी इनमे त्रुटि नहीं निकाल पाया। फिर भी बाद के जटिल स्तरों में त्रुटि की संभावना हो भी किन्तु पहला स्तर तो बिलकुल सिंपल है और मैं पुरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ की इसमें कोई त्रुटि नहीं है। इसकी जांच कई अन्य संस्थाओं द्वारा भी करायी जा चुकी है।"
"हाँ तो मैं तीसरी सम्भावना बता रहा था - वह यह की बिना किसी निषेध की अवज्ञा किये ही कण्ट्रोल पहले स्तर से दूसरे स्तर को चला गया हो। यह भी उस प्रोग्रामिंग की अवज्ञा ही है जिसके तहत कण्ट्रोल निचले स्तर को तभी ट्रांसफर होता है जब किसी निषेध की अवज्ञा की जाए। और इस तरह बात फिर भी वही है की रोबोटिक मानव ने पहले स्तर के प्रोगामिंग की अवज्ञा की। वह अपनी स्वतंत्रता की ओर पहला कदम बढ़ा चुका है। वो भी एक नहीं दो दो रोबोटिक मानव ने।"
प्रमुख - " अर्थात आपके पूरक रोबोट्स का सिद्धान्त कारगर रहा। दोनों ने एक तरह से एक दूसरे को प्रोग्रामिंग के अवज्ञा के लिये उकसाया। "
"हाँ, और हमने पाया की दो रोबोटिक मानव के मुक्त आपसी इंटरेक्शन से उनमे सेल्फ अवेयरनेस का भी विकास होता है। वह खुद को एक यूनिट मानने लगता है। पूरक रोबोट आपस में इंटरैक्ट करते हैं तो उनकी पर्सनल प्रोगामिंग कुछ समय के लिए गौण हो जाती है और इस तरह वो कभी कभी प्रोग्रामिंग की सीमा लाँघ जाते हैं।"
"अगर यह बात सच है तो मुझे आपके लिए ख़ुशी भी है और दुःख भी। पहले तो मैं आपको बधाई देना चाहता हूँ की आप आखिर अपने मिशन में कामयाब हुए। किन्तु आपको यह बताते हुए खेद भी हो रहा है की इस प्रयोग को आगे जारी रखने की अनुमति मैं नहीं दे सकता। आपको इस मिशन को यहीं टर्मिनेट करना होगा।"
" वास्तविक आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का विकास हमारे समाज के लिए कई मुसीबतें पैदा करेगा। अपने समाज में हम मानव जाति के अलावा अन्य किसी सेल्फ अवेयर, इंटैलिजेंट जीव को स्थान नहीं दे सकते। अपनी अन्य सुपीरियर क्षमताओं के साथ रोबोट्स में यदि सेल्फ अवेयरनेस आ जाये और साथ में प्रोग्रामिंग को डिस-ऑबे करने की क्षमता भी, तो हमारे पास उनको कण्ट्रोल करने का कई साधन नहीं रह जाएगे। वो निश्चित रूप से हमपे डोमिनेट करना चाहेंगे। फिर हमारी क्या स्थिति होगी आप खुद ही सोंच सकते हैं।"
"फिर भी श्रीमान!....." प्रतिनिधि अपना कुछ तर्क रखना चाह रहे थे परन्तु प्रमुख ने उन्हें बीच में ही रोक दिया ।
"नहीं इस सम्बन्ध में मैं कुछ नहीं सुन सकता। शर्तें पहले से तय थीं। इस मिशन को आपको यहीं रोकना होगा। अब आप जा सकते हैं।"
"धन्यवाद!"
* * *
प्रतिनिधि लौट कर अपनी टीम को विश्व- संस्था का फैसला सुना रहे थे। किन्तु वहां कोई भी अपने इन दोनों रोबोटिक मानव आदम और ईव को नष्ट करने के लिए तैयार नहीं था।सबको उनसे एक तरह का लगाव हो गया था। वैसे इस प्रोजेक्ट को बंद करने के लिए सब तैयार थे। इस प्रोजेक्ट को काफी विचार विमर्श के बाद इसी शर्त पर अनुमति मिली थी की जैसे ही रोबोट्स में सेल्फ कॉन्शियसनेस की शुरुआत होगी इस प्रोजेक्ट को टर्मिनेट कर दिया जाएगा। लेकिन दोनों रोबोट से टीम के हर सदस्य का इतना जुड़ाव हो गया था की वो उनको नष्ट करने का फैसला नहीं ले पा रहे थे। अंत में फैसला लिया गया की इन दोनों रोबोट्स को किसी सुदूर ग्रह पर पहुंच कर छोड़ दिया जाए।
* * *
और इस तरह से आदम और इव को वर्जित फल खाने की सजा मिली और उन्हे ईडन से निकाल कर किसी सुदूर ग्रह में छोड़ आया गया। उसके बाद उनका क्या हुआ ये हम आज तक नहीं जानते हैं। शायद उन्होंने वहां एक नयी दुनियां बसा ली हो।
Monday, 9 May 2016
भूटान: At the centre of talk about happiness
भूटान- हिमालय की गोद में बसा, रहस्यों का संसार कहा जाने वाला यह देश कई मामलों में अनोखा है। यह उत्तर में चीन से तथा पूर्व पश्चिम और दक्षिण में भारत से घिरा है। पश्चिम में नेपाल से इसे सिक्किम अलग करता है- तो बांग्लादेश से अरुणाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल। चीन की ओर तिब्बत से इसका सम्बन्ध पूरी तरह से कटा हुआ है (हालाँकि सांस्कृतिक और धर्मिक रूप से यह तिब्बत से काफी निकट है)। भूटान की राजधानी थिम्फू है जो इसका सबसे बड़ा शहर भी है। यहाँ की मुद्रा नोंगत्रूम तथा भाषा जोंगखा है। तीरंदाजी यहाँ का लोकप्रिय खेल है और इसकी प्रतियोगिता का आयोजन किसी उत्सव की भांति किया जाता है। विश्व का एक मात्र ऐसा देश है जहाँ बौद्ध धर्म की वज्रायन शाखा का पालन होता है। अभी हाल तक यहाँ विदेशी यात्रियों के पर्यटन की अनुमति नहीं थी। [और अभी भी विदेशी पर्यटकों (भारत, बांग्लादेश और म्यांमार को छोड़ कर ) को प्रतिदिन के हिसाब से 250 $ पहले से जमा कराने होते हैं जिसमे ट्रेवल एजेंट का लगभग सारा खर्च आ जाता है।] । यहाँ के लोग अपने देश को द्रुक- यूल ( वज्र- ड्रैगन का देश ) के नाम से जानते हैं।
* * *
इतिहास गवाह रहा है की किसी भी देश में जनतंत्र विद्रोह के कई चरणों के बाद ही स्थापित हो सका है। हर जगह ऐसे विद्रोह को आरम्भ में क्रूरता से दबाने की कोशिश की गयी है - क्रूरता का स्तर अलग अलग हो सकता है। किन्तु अपने इस पडोसी मुल्क में राजा ने बिना किसी विद्रोह के खुद अपनी मर्जी से अपने पद से ऊपर संविधान को स्थान दिया। देश की सरकार सन 2008 में राजशाही से एकात्मक संसदीय संवैधानिक राजशाही में रूपांतरित हो गयी, जो मोटे तौर पर इंग्लैंड के सामान है। इसके तहत प्रधानमंत्री तथा संसदीय सभा के अन्य सदस्यों का चयन जनता आम चुनाव के द्वारा करती है। इस संसदीय सभा को 2 तिहाई बहुमत से राजा को भी पदच्युत करने का अधिकार प्राप्त है।
लोकतंत्रीकरण की यह प्रक्रिया 1953 ई. में जिग्मे दोरजी वांगचुक के समय ही आरम्भ हो गयी थी जब उन्होने राष्ट्रीय सभा का गठन किया था जिसमे हर जिले के जन प्रतिनिधि होते थे जो कानून निर्माण प्रक्रिया में राजा को सलाह दे सकते थे। उन्होंने ही को विकास को मापने का पैमाना धन सम्पदा की जगह समृध्दि और खुशहाली को माना था। उन्होंने 1971 UN में भूटान के प्रवेश के उपलक्ष्य में दिए गए अपने भाषण में भी इसपे जोर डाला था। GDP (gross domestic product ) Vs GNH (gross national happiness) का मामला वहीँ से आरम्भ हुआ। उनके उत्तराधिकारी जिग्मे सिग्वे वांगचुक के अनुसार सरकार का उत्तरदायित्व जनता की खुशहाली होनी चाहिए। जिसके चार मुख्य आधार हैं-
1. न्यायोचित समान सामाजिक- आर्थिक विकास।
2. सांस्कृतिक-आध्यात्मिक विरासत का संरक्षण और उन्नयन।
3. पर्यावरण संरक्षण।
4. कुशल लोकहितकारी प्रशासन।
बिजिनेस वीक द्वारा 2006 में कराये गए सर्वे में इसे एशिया का सबसे खुशहाल देश बताया गया था। हम अपने स्तर पर सोंचे तो खुशहाली का मापक क्या हो सकता है? की लोग खुश हों। आशान्वित हों। धरती सस्य श्यामल हो। जल और वायु प्रदूषण से रहित हों। मौसम लिए स्वास्थ्यप्रद हो। सरकार प्रजा की ख़ुशी का ध्यान रखे। और सबसे बढ़कर लोग अपने उपलब्ध संसाधनों के अंदर जीना जानते हों। इस कसौटी पर देखें तो भूटान की वास्तव में खुशहाल है। धरती ऐसी सस्य श्यामला की काफी बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए हिमाच्छादित होते हुए भी सरकारी आंकड़ों के हिसाब से भूटान का 70% क्षेत्र वनाच्छादित है जिसमे से 60% क्षेत्र संरक्षित है। देश कृषि प्रधान है और मैदानी इलाकों में वर्षा प्रचूर मात्रा में होती है । अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग तरह के मौसम की प्रधानता है। अर्थात लगभग हर तरह का मौसम उपलब्ध है। जल और वायु तो स्वच्छ हैं ही । प्लास्टिक पर पूरी तरह रोक है। वहां के लोग इसे एक पवित्र पुण्य भूमि मानते हैं। उनका मानना है की यह भगवान बुद्ध की भूमि है और भगवान इसके कण कण में स्वयं विद्यमान हैं। इसी कारण वे आपस में भी बहुत शालीनता से बातचीत करते हैं। और आसपास की शांति को भंग करने का कम से कम प्रयत्न करते हैं *। यहाँ के लोग राजा को अपने पिता की भांति मानते हैं और राजा भी अपनी प्रजा की खुशहाली के हर संभव प्रयास करता है। स्वास्थ्य और शिक्षा सबके के लिए मुफ़्त है। राजा द्वारा उच्च शिक्षा को बढ़ावा दिया जाता है। राजकोष द्वारा होनहार छात्रों के भारत या ब्रिटेन के अच्छे संस्थानों में पढ़ाई की भी व्यवस्था की जाती है। हर गांव तक पीने के पानी, सड़क, बिजली की पहुँच है। तो ऐसे ही नहीं भूटान को कहा जाता है "The last sangrila".
* * *
* यहाँ से
Saturday, 7 May 2016
दो कवितायेँ
हालाँकि मुझे अधिकार नहीं है
फिर भी मैं चाहता हूँ
की तुम आजादी के लिए प्रयत्न करो
इसलिए नहीं की सब ऐसा करते हैं,
किसी फैसन में बने रहने के लिए नहीं
चलन की गुलामी में नहीं ।
अपनी आँखे खोलो
और दुनिया को खुद नजर से देखो
उधार के नजरिये से नहीं ।
(2)
की मैंने क्या -क्या सोंच रखे थे
तुम्हारे लिए....
की क्या! मुझे अधिकार था
तुम्हारे लिए कुछ सोंचने का ?
क्या मैंने वास्तव में तुम्हारे लिए सोंचा था,
या वो मेरे ही शौक थे ।
Saturday, 23 April 2016
मैं प्रगतिवादी हूँ
मैं प्रगतिवादी हूँ -
क्योंकि मैं अपडेट रहता हूँ प्रगतिवादियों के चलन से ।
-कुछ भी ऐसा नहीं करता प्रगतिवादी जिसका विरोध करे ।
Saturday, 16 April 2016
Wednesday, 21 October 2015
रक्षक
सभ्यता-संस्कृति के...
खुद को रक्षक मानते हो तो ये कुल्हारी?
क्या कहा?-
इस वाटिका की रक्षा के लिए ।
इसपे होने वाले हमले से लोहा लेने के लिए ।
बेडौल, बेतरतीब उग आये
झार-पतवार से निपटने के लिए ।
लेकिन मैंने तो तुम्हे अक्सर उन वट- पीपलों पे वार करते देखा है
जिनके छाँव तले
वाटिका पनपी है ।
नासमझों!
कुछ न समझ आये तो
कुल्हारी फ़ेंक दो
रक्षक होने का भाव छोड़ दो।
जब तक ये वट-पीपल हैं
चमकता सूरज है
धरती उर्वर है
वाटिका में पौधे उगते रहेंगे
नित नए-नए।
Saturday, 10 October 2015
Thursday, 1 October 2015
ये कैसी लपलपाती आग है
ये कैसी लपलपाती आग है
जो जल रही है।
जिसके जद में खरगोश, चूहे, बिल्ली, आते हैं
और आते है घास, पतवार,
हिरन, बकरी, कुत्ते और सियार।
सब जल रहे हैं
उबल रहें हैं
और एक दूसरे को जला रहे हैं
झुलसा रहे हैं ।
किसी को एक चीटीं काट ले
तो जाग उठती है उसकी जलन
लपटें छोड़ता निकल पड़ता है
अपराधी की तलाश में
जलाने अपने जैसे किसी को
प्रतिशोध की आग में
वह नियंता सजा मुक़र्रर करता है
सजाये मौत बाटता फिरता है
अपने जैसे नाकारों के बीच।
पर हाथी और शेर
इस आग की चपेट में नहीं आते
वो तो इस आग की लपट पर
अपनी अपनी रोटिया और गोस्त सेंकतेे हैं।
Wednesday, 23 September 2015
inspirations to cross the darkness of night
रात :
पर मैं जी रहा हूँ निडर
जैसे कमल
जैसे पंथी
जैसे सूर्य
क्योंकि
कल भी हम खिलेंगे
हम चलेंगे
हम उगेंगे
और वो सब साथ होंगे
आज जिनको रात ने भटक दिया है।
-धर्मवीर भारती
- गीता के सार सी मालूम होती हैं मुझे ये पंक्तियाँ । निराशा के क्षणों में ये पंक्तियाँ भाग्यवाद का विरोध किये बगैर उससे परे हो जाने का साहस देती है । हम निर्भीक हैं इसलिए नहीं की वक़्त सबकुछ ठीक कर देगा बल्कि इसलिए की हम हारे नहीं हैं हम अभी भी खिलने, चलने और उगने का माद्दा रखते हैं। रात्रि के विश्रान्ति के बाद जब हम फिर से तरो-ताजा होकर खिलेंगे, चलेंगे और उगेंगे तो हम अपनी हर खोयी हुयी उपलब्धियों को फिर से हासिल कर लेंगे।
...........................................................................
रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियाँ भी निराश होने की मनाही उसी तरह करतीं है जैसे William Wordsworth की ये पंक्तियाँ-
Monday, 21 September 2015
मलवा
इनमें भी एक जीता जागता जीवन है!
क्या कहा - ?
सड़न है, दुर्गन्ध आती है,
सीलन है, दीवारें जर्जर हैं ,
कई जीवन कैद हैं इनके भीतर,
कई जीवन दफन हैं इनके नीव तले !
तो दो हथौड़ा-
मैं भी तुम्हारे साथ हूँ-
नेस्तनाबूत कर दें सब दीवार, सब मकान,
पर पहले इतना तो बता दो-
इसके बाद क्या करोगे ?
यहाँ नया महल बनाओगे,
नई इमारत खड़ी करोगे,
या सुन्दर सी कुटिया बनाओगे ?
या फिर बनाओगे यहाँ सुन्दर बगीचा, या समतल मैदान ?
....... अरे सुनो !
कम से कम ये मालवा तो साफ़ करते जाओ......!
Wednesday, 2 September 2015
दिल्ली से बिछुड़ते समय
मैं नहीं चाहूँगा
की दिल्ली मेरे रग रग में बहे
जरूरत बनकर।
मैं चाहूँगा की जैसे
यादों की खुसबू बनकर
मौके बेमौके महकते हैं
देहरादून और नागपुर।
या फिर दोस्तों के निश्चिन्त ठहाकों की तरह
जैसे कानों में कभी कभी गूंज जाता है हैदराबाद।
वैसे ही किसी भूले बिसरे गीत की तरह
मेरे पल दो पल को झनकाति हुई
गुजर जाए ये दिल्ली....
क्योंकि जरूरत और मोहोब्बत
दो अलग अलग चीज हैं
मोहोब्बत आजादी है
जबकि जरूरत गुलामी....
Saturday, 22 August 2015
तूँ और मैं
"देखो दिल के मामले में सहूलियत से काम लेना चाहिए । प्यार को धीरे धीरे पनपने दो । धीमे आंच पर पकने दो । हर लम्हे को महसूस करो ।"
"अच्छा ! तो पहले आप decide कर लो की प्यार करना इम्पोर्टेन्ट है की महसूस करना । क्योंकि महसूस करने के लिए तो आपके पास समय की कोई कमी नहीं है। अभी खुद ही खुद के दिल में प्यार का पनपना महसूस करो फिर कुछ समय बाद दिल का दर्द महसूस करना। चाहो तो उस दर्द के सहारे जिंदगी गुजार लेना। लेकिन अगर प्यार को जीना चाहते हो तो थोड़ी स्पीड बढ़ाओ । कम से कम उसे पता तो चले की कोई उसे नोटिस कर रहा है। के कोई उससे कुछ कहना चाहता है । के कोई उससे कुछ कहने में हिचक रहा है । वो आज के जमाने की लड़की है । वही 4G स्पीड वाली । छोटी-छोटी महसूस करने वाली बातों पर उसका ध्यान नहीं जायेगा। आखिर नोटिस करे भी तो कैसे जिस ओकेशन पे तुम उसे एक फूल भेजोगे उसी ओकेशन पे उसके पास बीसों गुलदस्ते ,बुके पहुंचते हैं । तुम्हारी एक सहमी हुयी सी hi! को उन अनगिनत hugs के भीड़ में आखिर वो कहाँ से याद रखे ।"
* * *
08/07/15
होगा वो ओल्ड फैशन , मुझे क्या । सीधे मुह खुल कर बात भी नहीं की उसने मुझसे आज तक । FB पे रिक्वेस्ट भेजा था वो भी अभी तक एक्सेप्ट नहीं किया। नम्बर भी तो है मेरा उसके पास कभी कॉल या कम से कम मैसेज भी तो करता । और कुछ नहीं तो मेरे ही शहर का है इतनी तो courtsy होनी ही चाहिये । बड़ा पढ़ाकू है तो रहा करे । यहां कौन सा किसी के भरोसे बैठे हैं ।
* * *
07/08/15
अजीब है । इंसान है की ट्यूब लाईट । भक -भक----भक-- झकास। एक दो हाय हेलो हुआ नहीं की सीधे आई लव यु। क्या हुआ की वो मेरे शहर का है। हमारे मम्मी पापा अच्छे दोस्त हैं। बचपन में हमारी अच्छी जान पहचान थी। पर उसने तो आज तक कभी मुझमे इंट्रेस्ट दिखाया ही नहीं। और इस तरह अचानक । I simply can't believe it. Such a nut.
* * *
"क्या दादा ! ऐसे थोड़े होता है ।
वो भी क्या सोंचती होगी। बिलकुल पागल है ।
सीधे प्रोपोज़ कर दिया। आखिर ऐसी भी क्या जल्दी थी। थोडा तो....
Saturday, 4 July 2015
नजरिया -: सिलसिला
"नयनों में निंदिया
निंदिया में सपने
सपनों में साजन -
जब से बसा ,
बहारें आई जीवन में
नयी हलचल है तन-मन में ....."
- शेखर (शशि) और शोभा (जया) किसी बाग़ में चंद खूबसूरत लम्हे सहेज रहे हैं। शेखर कश्मीर में पोस्टेड एयर-फोर्स का फाइटर पायलट है। वह या तो आकाश में होता है या धरती पर। आकाश - ड्यूटी है; तो धरती- शोभा अमित और rum.
अगली बार जब पार्क में दोनों होते हैं तो अमित के आवाज की एंट्री होती है; शेखर शोभा को अपने भाई अमित की रिकॉर्डिंग सुनाते हैं -
"जिन राहों में तेरे साथ गुजरने की तमन्ना थी
आज उन राहों से मैं तनहा गुजर आया
चारों तरफ एक ऐसा सन्नाटा है
कि आदमी खुद से भी बात न कर सके
मैं अकेला
तनहा
पूछता हूँ
वो कौन है जो
इन हसीं मनाज़िर से पड़े
वक़्त की गिरफ्त से बाहर
मेरा इंतजार कर रहा है
वो कौन है "
-खुरदुरी सी आवाज में दर्द , दर्द में एक मीठापन -एक तलाश…।
उधर अमित को एक दोस्त की शादी में उसकी चुलबुली सी चांदनी (रेखा) मिल जाती है। उसे अमित का पहला तोहफा मिलता है -गुलाब के एक गुच्छे के साथ उसी खुरदुरी आवाज में एक तजवीज़- कि हर महीने ऐसा एक गुलदस्ता आपके लिए होगा। -प्यार का इतना प्यारा वादा कानों में जैसे संगीत घोल देता है।
भाई अमित को खुशनुमा मौसम का हवाला दे कर कश्मीर बुलाता है। अमित पंहुचा तो जनाब खुद गायब - ड्यटी है भई।
शोभा एयर पोर्ट पर अमित को देखते ही पहचान लेती है- "लम्बा ,चौड़ा, ऊँचा - आँखों में जिंदगी की चमक - आवाज जो सुनते ही दिल में उतर जाए -"
गाड़ी चलती है - बातें चलती है- अपनी और भाई के पुराने दिनों की यादें - कैसे दोनों हर काम साथ करते थे यहाँ तक की उन्हें पहला प्यार भी एक साथ और एक के ही साथ हुआ।
बोतलें खुलती है - बातें चलती हैं - बीते दिनों की यादें।
कभी तीन-अमित, शेखर और शोभा; तो कभी दोनों भाई, कुछ समय यूँ ही गुजर जाता है।
* *** *
फूल उस खुरदुरी आवाज के साथ चांदनी तक फिर से पहुँचते हैं -
"कश्मीर की वादी में
अनजाने में कई बार
आपका नाम पुकारा है-
चांदनी … चांदनी…,
कल दिन भर मैं आपके नाम के साथ-
अपना नाम लिखता रहा।
दो लफ्ज हैं तनहा - अकेले
लेकिन एक साथ लिख दियें जाएँ
तो एक दुनिया
एक कायनात
एक तलाश
एक लम्हा
एक खुशी
बन सकते हैं "
कानों में फिर से जैसे कोई संगीत घुल जाता है -
"वहमों -गुमान से दूर दूर
यकीं के हद के आस पास
दिल को भरम ये हो गया -
उनको हमसे प्यार है……"
अमित के आवाज में एक डायलॉग और सुनते हैं -
"साँस लेना - साँस लेते रहना -
जिंदगी नहीं है, जिन्दा रहने की आदत है.…
एक शून्य हो तुम लोग -
शून्य से शुरू होकर - शून्य पर ख़त्म हो जाते हो।
जो तुम सोंचना चाहते हो सोंच नहीं सकते -
जो तुम कहना चाहते हो कह नहीं सकते -
जैसे तुम जीना चाहते हो जी नहीं सकते।
जब तुम चिल्लाते हो -तो तुम्हारी आवाज पलट कर नहीं आती
प्यार, मोहब्बत, दोस्ती , देश -प्रेम -- सब के सब खोखले शब्द हैं;
इनका हकीकत से कोई वास्ता नहीं।
अब भी वक़्त है
वो तुम्हे बुला रहा है -उसे ध्यान सुनो -
डरो नहीं ,
अपने आप से श मिन्दा मत हो ,
आवाज सुनो-
आवाज दो - कि तुम आजाद हो
इंकार की नींव डालो
कहो - कि बनावट की जिंदगी ,
झूठ की जिंदगी ,
फरेब की जिंदगी -
तुम नहीं जी सकते
अपनी अपनी खिड़किया खोलो
बहार निकलो -
और चिल्लाओ- कि हम आजाद हैं ,
पुकारो कि- हम आजाद हैं ,
आवाज दो कि हम आजाद हैं ,
… हम.... आ...जा......द… हैं ........"
बात है की अमित जी नाटककार हैं। अभी वो मंच पर अपने नाटक के पक्ष में समा बांध रहे थे और दर्शक दीर्घा की अगली पंक्ति में ही उनकी चांदनी जी बैठी हुई थे। मंचन पूर्ण होते ही हॉल तालियों से गूंज उठता है। लौटते वक़्त अमित और चांदनी की चाहत अगले पड़ाव तक कुछ इस तरह पहुचती है -
-'वो बात जो मैं आपसे कहना चाहता हूँ कह दूँ ?'
-'वो बात जो मैं सुनना चाहती हूँ कह दीजिये।'
पर इस लफ्फाजी में इजहारो -इकरार अधूरा ही रह जाता है।
आगे खूबसूरत लम्हों से सजे कुछ यादगार मुलाकातों का दौर चलता है-
"… ओस बरसें -
रात भींगे-
होंठ थर्राए
धड़कनें कुछ
कहना चाहें -
कह नहीं पाए
हवा का गीत मद्धम है
समय की चाल भी कम है..... "
* * *
जिंदगी कितनी खूबसूरत है- "कश्मीर की वादियों की तरह"-"फूलों की तरह'"। परन्तु युद्ध सबकुछ तहस-नहस कर डालता है। पूरी की पूरी वादी सुलगने लगती है। जड़, तना, पत्ते तो क्या फूल तक झुलस जाते हैं। जानते हुए भी की फिल्म है पूरे शरीर में झुरझुरी सी फैल जाती है। टीवी सेट में समाचार आता है कि फिरोजपुर सेक्टर में दुश्मनो के चार जंगी जहाज गिरा कर स्क्वा. लि. शेखर मल्होत्रा शहीद हो गए। एक दुनिया डूब गई। चीख,रुदन फिल्म के परदे से ज्यादा दर्शक के खुद के अंदर मच जाती है -
"पिछली जंग ने मेरे पिताजी मुझसे छीन लिया - मैं नहीं रोया।
मेरी माँ इस दुःख को बर्दास्त न कर सकी - उस गम को भी मैं झेल गया- मैं नहीं रोया।
क्योंकि मेरी माँ , मेरा बाप, मेरा दोस्त, मेरा यार - मेरा भाई मेरे साथ था।
-लेकिन आज मैं लुट गया - यतीम हो गया। ''
ऐसे समय में शोभा पर जो बीती उसका कहना ही क्या। अमित पर एक दूसरा पहाड़ तब टूट पड़ता है जब उसे पता चलता है की शोभा प्रेगनेंट है। अमित शोभा को समझाना चाहता है पर सवालों के उहापोह में वह खुद घिर जाता है. समय के एक छन की यह उथल-पुथल उसकी जीवन के धारा को तोड़- मड़ोड़ कर रख देती है। शेखर के अतीत को भविष्य के मंजिल तक पहुचाने का फ़र्ज़ वह अपने ऊपर ओढ़ लेता है। जो अबतक उसका वर्तमान था, अतीत बन जाता है। .....
* * *
चांदनी अमित का खत पढ़ रही है -
' …… तुम मेरी हमसफ़र न सही ……हम दो कदम तो साथ चले थे……उन कदमों की कसम ……उन वादो की कसम ……उन वादों की कसम……मुझे भूल जाना चांदनी…… भूल जाना ……'
एक और दुनिया डूब जाती है -
"…आंसुओं में
चाँद डूबा
रात मुरझाई
ज़िन्दगी में
दूर तक
फैली है तन्हाई
जो गुजरे हम पे वो कम है
तुम्हारे गम का मौसम है…"
* * *
अमित और शोभा जैसे अपने- अपने हिस्से का एक कर्ज ढो रहे हैं। जैसे दोनों की जिंदगी किसी बंद अँधेरी गुफा में भटक गयी हो … प्रकाश बस सपनों-यादों में कभी कभी चमक जाता है। आँखों के सामने तो बस अँधेरा ही अँधेरा है … दोनों एक दूसरे से बंध तो गए हैं अब यदि साथ मिलकर रौशनी को तलाशें तो शायद इस अंधी गुफा का मुहाना मिल भी जाए लेकिन पिछली यादों की चकाचौंध रह-रह कर आँखे सुन्न कर जाती हैं। यादों के सामने हकीकत को कोई कैसे नकार सकता है। प्रकृति ऐसा होने नहीं देगी। यदि कोई जबरन नकारना चाहे तो सपनों पे हक़ीक़त की जबरदस्त चोट पड़ती है - अमित और शोभा का एक्सीडेंट हो जाता है। एक्सीडेंट में ये दोनों तो बच जाते हैं पर शोभा के पास जो बीते दिनों की - शेखर की अमानत थी वो चल गुजरती है। लगने लगता है कि यह इमोशनल झटका इन दोनों आपस में थोड़ा करीब ले आएगा। अमित कर्त्तव्य के तौर पर शोभा का ध्यान रखने लगता है। शोभा पहले तो अमित को इसके लिए आदर देती है पर धीरे-धीरे उसे अपना मानने लगाती है। किन्तु बीते दिन आस पास ही मंडरा रहे थे - हॉस्पिटल में जिस डॉक्टर ने दोनों का इलाज किया है वो महाशय चांदनी के पति हैं। चांदनी जो खुद भी यादों को पीछे छोड़ने के जद्दोजहद में थी, एक्सीडेंट की खबर सुनकर खुद को रोक नहीं पाती है और अमित से मिलने हॉस्पिटल चली आती है - भूत फलक पर ऐसे छाने लगता है कि वर्तमान को ढँक ले। अमित बार-बार अवश अतीत को आवाज दे बैठता है -
"हादसा बन के कोई ख्वाब बिखर जाए तो क्या हो !
वक़्त ज़ज्बात को तब्दील नहीं कर सकता
दूर हो जाने से अहसास नहीं मर सकता
ये मोहोब्बत है दिलों का रिश्ता
ऐसा रिश्ता जो जमीनों की तरह
सरहदों में कभी तक़सीम नहीं हो सकता
तूँ किसी और की रातों का हँसी चाँद सही -
मेरी दुनिया के हर रंग में शामिल तूँ है
तुझसे रौशन हैं मेरे ख्वाब - मेरी उम्मीदें -
मैं किसी राह से गुजरूँ मेरी मंजिल तूँ है "
उत्तर में एक विवश इंकार मिलता है-
"बहुत देर हो चुकी है अमित.... अतीत को आवाज मत दो .... तुम्हारी पत्नी है .... मेरे पति हैं .... दो घर उजरते देख सकते हो....?"
लेकिन यह इंकार रेत पर खिंचे लकीर से ज्यादा कुछ न था जो दिलों में उठते तूफानी लहरों के सामने कहीं न था। दोनों जिंदगियाँ अपने अतीत से बहाने बे-बहाने खुल कर मिलने लगी। वर्तमान में अतीत का प्रवेश आज के साथ नाइंसाफी है। आखिर वर्तमान कब तक इससे अनजान रहता- पहले थोड़ा खटका हुआ। नजर के देखे को भी दिल झुठलाने की कोशिश करता रहा। लेकिन कब तक। अतीत का भूत दोनों के सर पर ऐसे सवार हुआ की वर्तमान उनके आँखों से ओझल होने लगा। बंधन लगने लगा। एक समझौता लगाने लगा । और एक दिन उन्होंने वर्तमान को छोर कर अतीत के साथ रहने का फैसला ले लिया। वर्तमान ने चाह कर भी उन्हें नहीं रोका क्योंकि वर्तमान को अपने ऊपर विश्वास था। जाने वालों को जबरदस्ती रोक रखने का हठ वो करते हैं जिन्हे अपने प्रेम पर विश्वास न हो। वर्तमान किसी के लिए बंधन नहीं बनना चाहता था।
डॉ. साहब ने चांदनी को खुद ही राह दे दी। बॉम्बे जाते समय चांदनी से उनके उखड़े उखड़े वार्तालाप का समापन कुछ इस तरह हुआ -
"….... तुम्हे छोड़ने को जी नहीं कर रहा। मुझे उम्मीद है.… जब मैं घर वापस लौटूंगा तो तुम मुझे यहीं खड़ी मिलोगी। "
शोभा ने भी अमित को नहीं रोका -
"....... मम्मी ! एक बार तरस खा कर उन्होंने मुझसे शादी की थी। उसका नतीजा तुम भी देख रही हो। और मैं भी। मैं चाहती हूँ अगर वो आना चाहें तो अपनी मर्जी से। किसी समझौते या बहाने के सहारे नहीं। "
समय फिर से एक पिछले मोड़ पर खड़ा था। वह फिर से माँ बनने वाली थी पर वह इस खबर को अमित को खुद से बांधने के लिए जंजीर नहीं बनने देना चाहती थी।
लेकिन डा. साहब को लौटने के समय चांदनी का उनका इन्तजार न कर रही होना शायद मंजूर न था -उनके प्लेन का क्रैश हो जाता है। समय के एक क्षण में फिर से भयंकर उथल-पुथल होती है। अमित और चांदनी दोनों अतीत के स्वस्प्न से जैसे आक्समात् जागते हैं। वर्तमान जब धूं -धूं कर जल रहा हो तो अतीत के स्वप्न का सहारा कोई कब तक लिए रह सकता है। अमित डा. साहेब को बचा पाने की उम्मीद में क्रैश-शाईट पे आग में कूद पड़ता है। शोभा समय के आवेग में अमित को अपने होने वाले बच्चे की कसम देकर रोकना चाहती है। लेकिन आज अमित को वर्तमान की अहमियत का पता चल चुका है। उसे आज वर्तमान के ऊपर विश्वास है।उसे यकीं है की वह चांदनी का वर्तमान उसे लौटा कर अपने वर्तमान के पास वापस आ सकेगा। और ऐसा होता भी है। आज अमित समझ चुका है की -जिंदगी में सबसे ताकतवर समय कोई है तो वो है वर्तमान। अथवा यह कहें जिंदगी वर्तमान ही है। वर्तमान ही जीवंत है। भूत को वर्तमान पर हावी होने देना अपराध है - वक़्त के प्रति , जिंदगी के प्रवाह के प्रति। यह प्रवाह ही तो जीवन है। वर्तमान में जीना ही आजादी है- काल के बंधन से दिशाओं के बंधन से।
"मैं आ गया हूँ शोभा। आया हूँ तो सारी दीवारें तोड़ कर आया हूँ। अपने अतीत की, अपने प्यार की ,अपने समझौतों की… अब इसके बाद बस एक बात याद रखना -तुम मेरी पत्नी हो , मैं तुम्हारा पति हूँ, यही सच है , बाकी सब झूठ ..... " नेपथ्य में फिर से संगीत घुल जाता है।














